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सुबह का भूला



Subah Ka Bhula: A Motivational Story


इंटर पास करने के बाद मुकेश कहीं बाहर पढ़ने की सोच रहा था। उसके दिमाग में कई शहर आ रहे थे। कभी वह दिल्ली जाने की सोचता तो कभी इलाहबाद। वह फैसला नहीं कर पा रहा था। पढाई में मुकेश अच्छा था। इंटर की परीक्षा वह अच्छे नंबरों से पास किया था। उसके कुछ मित्र इलाहाबाद जा रहे थे। मुकेश के पिताजी खेती करते थे। उसका एक भाई और दो बहनें थीं। वह घर में सबसे बड़ा था। घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी फिर भी उसके पिताजी की इच्छा थी कि वह बाहर जाकर पढ़ाई करे। पिताजी ने उसके जाने की पूरी तैयारी भी  कर दी थी।

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आखिरकार वह इलाहबाद आ ही गया। एक अच्छे कॉलेज में उसका एडमिशन हो गया था। उसे हॉस्टल भी मिल गया था। मुकेश यहाँ अच्छे से पढ़ाई करने लगा। पिताजी हर महीने उसके लिए पैसे भेजा करते थे। वह पिताजी की हालत देखकर पैसे लेना तो नहीं चाहता था किन्तु उसकी भी मज़बूरी थी। हॉस्टल में उसका रूममेट था अविनाश। अविनाश काफी पैसे वाले घर का था। पैसे का प्रभाव उसके रहन सहन और कमरे में भी दीखता था। पढाई के अलावा उसका हर काम में मन लगता था। मुकेश बहुत कोशिश करता था उसका प्रभाव उस पर न पड़े। किन्तु हॉस्टल का माहौल पढाई वाला नहीं बन पा रहा था। उसे अपनी पढाई करने में बहुत परेशानी होती थी। उसने कई बार अविनाश से इस बारे में बात की किन्तु अविनाश पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कमरे में नाच गाना पार्टी वार्टी सब चलता रहता। मज़बूरी में मुकेश को भी उसमे शामिल होना पड़ता। धीरे धीरे संगत ने अपना असर दिखाना शुरू किया। अब मुकेश भी उसी रंग में रंगने लगा। अब उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। दिन भर घूमना फिरना, सिनेमा देखना सिगरेट और कई अन्य लत उसे लग गए थे। खर्चे की चिंता नहीं थी अविनाश जो था। समय का पहिया घूमता रहा और एक दिन वहां पहुंच गया जहाँ रिजल्ट की घोषणा होनी थी। रिजल्ट आया। अविनाश और मुकेश दोनों फ़ैल हो गए। पिताजी तक खबर पहुंची। घर में मानो वज्रपात हो गया हो। पिताजी इलाहबाद पहुंच गए। मुकेश को बहुत समझाया उसे अपनी माली हालात का हवाला दिया उसकी पढ़ाई के लिए लिए गए कर्जों को भी दिखाया। मुकेश चुप चाप सुनता रहा, आखिर पिताजी ने उसके सर पर हाथ रखा और बिना कुछ कहे चले गए। कुछ दिनों तक लगा कि मुकेश सुधर गया है किन्तु वास्तव में ऐसी स्थिति नहीं थी। बुरी आदते इंसान को अपना गुलाम बना लेती हैं। मुकेश भी उनके चंगुल से निकल नहीं पा रहा था। एक दिन मुकेश पार्क में बैठ कर पढाई कर रहा था तभी उसकी मुलाकात अलका से हुई जो उसी के साथ पढ़ती थी। अलका उसे बहुत अच्छी लगती थी किन्तु वह संकोचवश उससे कुछ कह नहीं पाता था। आज भी वह अपनी किताबों में ध्यान लगा कर पढ़ने का उपक्रम कर रहा था बीच बीच में उसे कनखियों से देख भी लेता था। उसने देखा अलका जा रही है। अब वह उसे जाते हुए देखने लगा। तभी उसकी नज़र जहाँ अलका बैठी थी वहां गिरी एक किताब पर पड़ी। शायद अलका की कोई किताब छूट गयी है। मुकेश जाकर वह किताब उठाया और दौड़ा उसे देने को लेकिन तब तक वह ऑटो में बैठकर चली गयी थी। मुकेश उस किताब को पढ़ने लगा। पन्ना पलटते पलटते उसकी नज़र उसमे रखे एक कागज़ के टुकड़े पर पड़ी। वह उसे निकल कर पढ़ने लगा। वह प्रेमपत्र था जो अलका ने उसके नाम लिखा था। मुकेश को तो मानो मन की बात हो गयी। उसकी  ख़ुशी का ठिकाना न रहा। अब प्रेमपत्रों का आदान प्रदान होने लगा और फिर मुलाकाते होने लगीं। कुछ ही समय में वह मुकेश की मानो जान बन गयी थी।

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एक दिन वह अलका से मिलकर रात को करीब आठ बजे वापस हॉस्टल आया तो देखा कमरे में अविनाश अपने साथियों के साथ पार्टी कर रहा था। मुकेश आया तो वह भी पार्टी में शामिल हो गया। पार्टी में शराब का दौर भी चल रहा था। अविनाश ने मुकेश को भी अच्छी खासी पिला दी। पार्टी बहुत रात तक चली। सुबह बात वार्डन तक चली गयी। वार्डन काफी नाराज़ हो गए। उन्होंने दोनों को हॉस्टल खाली करने फरमान दे डाला। मुकेश ने उनके पैर पकड़ लिए किन्तु वार्डन नहीं माने। नतीजा दोनों को हॉस्टल खाली करना पड़ा। अब मुकेश की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। उसे कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था। तभी अविनाश ने उसका हाथ पकड़ा और बोला चलो बाहर कमरे किराये पर मिलते हैं वहीँ  रहा जायेगा। दोनों ने मिलकर एक कमरा किराये पर लिया और रहने लगे। अब तो और भी आज़ादी थी। कोई देखने वाला नहीं न कोई टोकने वाला। खूब मौज़ थी।
मौज़ मस्ती तो मुकेश अविनाश के पैसों पर कर लेता था किन्तु प्यार व्यार में भी तो कुछ खर्चे होते है। अलका के सामने मुकेश को अपना रुतबा दिखाने के लिए कुछ खर्च भी करने पड़ते थे। कभी होटल में खाना, कही घुमाने ले जाना, वह अलका को कभी खर्च करने नहीं देता सबके पैसे खुद ही देता। अपने प्यार को जताने के लिए उसे कभी कभी गिफ्ट आदि भी देने पड़ते। हालांकि मुकेश की हैसियत नहीं थी यह सब करने की तो भी वह जैसे तैसे करता था। मुकेश काफी परेशान रहने लगा था। कई बार वह अविनाश से उधार भी मांग चूका था। कुछ अन्य दोस्तों से भी वह उधार ले रखा था। इसी दौरान बातो ही बातो में उसे पता चला कि अलका का बर्थडे है। मुकेश परेशान हो गया उसे कोई अच्छा सा गिफ्ट देने के लिए। उसने अपने दोस्तों से कुछ पैसे मांगे मगर सबने इंकार कर दिया। वह कमरे में चहल कदमी कर रहा था तभी अविनाश ने कहा मै तुम्हे पैसे दे सकता हूँ , मुकेश के कदम रुक गए और बड़ी उम्मीद से अविनाश की ओर देखने लगा, अविनाश ने कहा एक शर्त पर मै पैसे दे सकता हूँ। मुकेश ने उसके हाथ पकड़ लिए और पूछने लगा बताओ बताओ क्या शर्त है मै तुम्हारी सब शर्त मानने को तैयार हूँ। अविनाश ने कहा सोच लो। मुकेश ने कहा सोच लिया बताओ। अविनाश ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए बोला तुम अलका से प्यार करते हो करो परन्तु उसके साथ मस्ती करने का एक मौका मुझे भी दिलाना होगा। मुकेश के तन बदन में आग लग गयी। उसने अविनाश का हाथ छोड़ दिया और जोर से चिल्लाया खबरदार जो अलका के बारे में कुछ ऐसा सोचा भी तो। तुम्हारे पैसे पर मै मूतता हूँ रखो अपने पैसे अपने पास। अविनाश ने फिर कहा सोच लो। मुकेश को बहुत गुस्सा आ रहा था। वह बाहर निकल गया। घूमते घूमते वह बाजार पहुंच गया। बाज़ार में बहुत भीड़ थी। उसके पास एक चांदी की अंगूठी थी। उसने  सोचा इसे गिरवी रख कर कुछ पैसे का इंतेज़ाम कर ले। वह एक सुनार की दुकान पर गया और अपनी अंगूठी दिखाई। सुनार ने अंगूठी देखने के बाद कहा अरे यह तो बहुत ही हलकी अंगूठी है। इसकी चांदी भी घटिया है। मै इसके बमुश्किल पाँच सौ रुपये दे सकता हूँ। मुकेश के पास और कोई चारा नहीं था। वह पांच सौ रुपये लिया और अपना नाम पता वहां नोट करा दिया। मुकेश बड़ी ख़ुशी ख़ुशी वापस अपने कमरे की ओर चला। सोचा इन पैसों से कुछ न कुछ गिफ्ट का इंतेज़ाम हो जाएगा। वह कमरे पर आया और बढ़िया से तैयार होकर अलका से मिलने चला गया। उसने अलका के लिए एक गिफ्ट लिया और फिर पार्क में उसका इंतज़ार करने लगा। अलका आयी, उसने उसे विश किया और गिफ्ट दे दिया फिर दोनों पास के ही रेस्टोरेंट में गए। आज मुकेश बहुत ही खुश नज़र आ रहा था। कब शाम हो गयी पता ही नहीं चला। करीब आठ बजे वह जब अपने कमरे में आया तो देखा पुलिस आयी हुई है। वह कुछ बोले इसके पहले पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। वहीँ पर वह सुनार भी था। उसने पुलिस को बोला सर इसी ने मेरा हार चुराया है। मुकेश ने कहा मैंने ? मै तो वहां अपनी अंगूठी गिरवी रखने गया था। सुनार बोला हाँ तुमने अंगूठी गिरवी रखी है और उसी समय से मेरा हार गायब हुआ है वहां तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं था। वह लाख कहता रह गया किन्तु किसी ने उसकी नहीं सुनी। पुलिस उसे थाने ले गयी। उसके घर पर भी खबर चली गयी। उसके पिताजी भागे भागे आये। पिताजी जमानत की कोशिश करने लगे। 



काफी प्रयास करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। मुकेश को रात थाने पर ही काटनी पड़ी। अगले दिन पिताजी फिर थाने पर आये, पुलिस वालों से मिन्नतें करने लगे उसे छोड़ने के लिए। तभी कुछ पुलिस वाले एक आदमी को पकड़ कर लाये और बोले हार का असली चोर पकड़ा गया है इस लड़के को छोड़ दो। हार उसी आदमी के पास बरामद भी हो गया और उसने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया था। कुछ कागजी कार्रवाइयों के बाद मुकेश को छोड़ दिया गया। पिताजी मुकेश को सीधे गांव ले गए। गांव मुकेश चला तो गया था किन्तु उसका मन नहीं लग रहा था वहां। वह दिन रात अलका की यादों में खोया रहता था। सपने में भी उसे अलका ही दिखाई पड़ती थी। करीब एक महीने तक तो वह किसी तरह से गाँव में रहा फिर वह ट्रैन पकड़ इलाहबाद भाग आया। इलाहबाद स्टेशन उतर कर वह सोचा चलो पहले अपने कमरे पर चलकर फ्रेश व्रेश हो लूँ फिर अलका से मिलने जाऊँगा। वह ऑटो पकड़ कर अपने कमरे पर आया। ऑटो वाले को पैसे देकर ज्योंही वह कमरे में पंहुचा उसे कमरे से किसी लड़की के हंसने की आवाज सुनाई दी। वह कमरे में झांक कर देखा तो उसके होश उड़ गए। अविनाश और अलका दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठे थे और खिलखिला रहे थे। उसे देखते ही दोनों अलग हो गए और अलका जाने लगी। मुकेश को तो मानो काठ मार गया हो। उसके बाद कई बार वह अलका से मिलने की कोशिश किया किन्तु हर बार अलका ने मना कर दिया। वह एकदम निराश हो गया था। उसे जीवन एक छलावा लगने लगा था। उसे लगा अब उसके जीवन में कुछ बचा ही नहीं है। एकदिन जीवन से हार कर वह यमुना पूल पर पहुंच गया और पूल से नीचे छलांग लगा कर अपनी ईहलीला समाप्त करने की सोची। वह नीचे नदी में देख रहा था तभी उसकी नज़र नदी में बह रहे एक कुत्ते पर पड़ी।  नदी की धारा उसे बहा ले जा रही थी किन्तु कुत्ता धारा के विरुद्ध अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा था। वह बार बार किनारे पर पहुंचने की कोशिश कर रहा था और नदी बार बार उसे बहा ले जा रही थी। काफी जद्दोजहद के उपरांत करीब एक घंटे के बाद संघर्ष करते करते आखिर कुत्ता किनारे तक पहुंच गया। मुकेश के दिमाग के अँधेरे में मानों रौशनी की एक किरण दीख गयी। उसने सोचा जब एक कुत्ता अपने जीवन के लिए यमुना के अथाह जल से संघर्ष कर सकता है तो मै तो इंसान हूँ। उसने आत्महत्या का अपना इरादा त्याग दिया।
 मुकेश ने अब तय कर लिया कि अब वह पढाई में मन लगाएगा। उसने अविनाश से दुरी बढ़ानी शुरू कर दी। अब वह नियमित रूप से कॉलेज जाता और बाकी की पढाई लाइब्रेरी में या पार्क में करने लगा। कमरे में वह केवल सोने आता था।वह अपने खर्चों के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगा। धीरे धीरे दो महीने बीत गए। अब उसकी गिनती क्लास के अच्छे छात्रों में होने लगी थी। वह ऐसे पढ़ाई करने लगा मानों उसने अपनी जान लगा दी हो।एक दिन वह भी समय आया और वह परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुआ। पढ़ाई के साथ साथ वह नौकरी की परीक्षाओं की भी तैयारी कर रहा था। आखिर उसके परिश्रम ने उसे उसकी मंज़िल दिला ही दी। वह संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण करके आई ए एस के पद पर नियुक्त हुआ। वह नियुक्ति पत्र लेकर सीधे अपने गांव गया और अपने पिता के पैरों पर गिर पड़ा और अपनी पूर्व की गलतियों के लिए माफ़ी मांगने लगा। पिताजी ने उसे उठाया और गले लगाकर बोले बेटा सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाये तो उसे भूला  नहीं कहते। 

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