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#metoo Campaign Kya Hai Hindi Me

एक बात तो साफ़ है  महिलाओं के प्रति पुरे विश्व में कहीं भी नज़र डालिए स्थिति एक सी दिखती है। चाहे वह वाइट कालर जॉब हो या फिर सामान्य मज़दूरी का काम हो , कहीं भी उनकी प्रतिभा और कौशल पर उनका महिला होना भारी पड़ जाता है।  इस पुरुष प्रधान  समाज में उनके हाँ और नहीं और उनकी चुप्पी का मतलब अपने हिसाब से निकाल लिया जाता है। उनके जॉब, उनके और भी दूसरे कामों के लिए उनका महिला होना उनकी मज़बूरी बन जाता है। चाहे जॉब पाना हो, जॉब को सुरक्षित रखना हो या प्रमोशन पाना हो हर जगह आपको अपने महिला होने की कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसा नहीं है कि हर जगह यही स्थिति हो या किसी संस्थान में सारे कर्मचारी ऐसे ही हो पर ऐसी स्थिति नहीं है यह कोई गारंटी के साथ नहीं कह सकता।यह स्थिति बलात्कार या छेड़खानी से भी ज्यादा दुखद और अफसोसजनक होती है क्योंकि बलात्कार और छेड़खानी में तो एक बार अपराधी के खिलाफ एक्शन भी लिया जा सकता है किन्तु इस तरह के यौन शोषण, छेड़खानी में नौकरी भर पीड़िता को अपमान का घूंट पीना पड़ता है। अपराधी के साथ काम करना पड़ता है। जिसने हिम्मत की विरोध करने की उन्हें नौकरी से निकाल देने की धमकी मिलती है बदनामी जो होती है वो अलग से। पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से बात पुरुषों की ही सुनी जाती है। पीड़िता के ऊपर जिम्मेदारी थोप दी जाती है आरोप साबित करने की सबूत लाने की। समाज भी पीड़िता पर ही लांछन लगाता  है उसके चरित्र पर ऊँगली उठाता है। अच्छा तो बॉस को पटा रही थी प्रमोशन के लिए , हंस हंस के बाते करके काम हथियाना चाहती है। 
लेकिन स्थिति में अब थोड़ा सुधार आ रहा है कुछ लड़कियों ने काफी हिम्मत दिखाई है इस घिनौने अपराध को सामने लाने में। और चमकते हुए दर्पण के पीछे की कालिख अब लोगों के सामने आने लगी है। कहते हैं संगठन में शक्ति होती है और यही शक्ति #Metoo कैम्पेन के रूप में सामने आ रही है। मर्दों के चेहरे से शराफत का नकाब उतर रहा है और अब पता चल रहा है कि हमाम में सब नंगे हैं। चाहे वह कास्टिंग काउच के रूप में हो या किसी दफ्तर में होने वाली अनैतिक डिमांड हो इन बहादुर लड़कियों ने सब को नंगा कर दिया है। दुनिया के अपराधों पर ऊँगली उठाने वाले पत्रकार खुद कितने बड़े अपराधी हैं अब समाज को पता चल रहा है।  

#metoo कैंपेन क्या है और यह कब शुरू हुआ 


2006 अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्त्ता टेरेना बर्क ने सबसे पहले अपने साथ हुए यौन शोषण का आरोप लगाते हुए meetoo शब्दों का प्रयोग किया। 2017 में  हॉलीवुड एक्ट्रेस अलिसा मिलानो ने भी इसी तरह के आरोप लगाए। इसी दौरान किसी ने उन्हें टैग करते हुए लिखा  वो #meetoo के जरिये अपनी बात रखे। मिलानो ने ऐसा ही किया।और हॉलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे वाइंस्टीन पर 50 से अधिक महिलाओं ने पिछले तीन दशकों में अपने साथ हुए यौन शोषण के आरोप लगाए।और कुछ ही दिनों में करीब 32 हजार महिलाओं ने इस हैश टैग द्वारा अपनी बातें शेयर की। धीरे धीरे #meetoo एक कैंपेन बन गया और पुरे विश्व से महिलाएं इससे जुड़ने लगी। भारत में इसकी शुरुवात 2017 में हुई और हाल ही में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने करीब दस साल पहले फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर घटी घटना का जिक्र करते हुए किया। तनु ने नाना पाटेकर पर सेक्सुअल हैरसमेंट के आरोप लगाए। तनु ने कोरिओग्राफर गणेश आचार्य पर भी आरोप लगाए। अभी हाल ही में उनके इंटरव्यू में इस घटना की चर्चा को किसी ने #metoo कैंपेन से जोड़ दिया। फिर तो भारत में जैसे भूचाल ही आगया। विकास बहल ,रजत कपूर,अभिनेता आलोक नाथ, कैलाश खेर, विधायक माधवन मुकेश,केंद्रीय मंत्री एम् जे अकबर सहित कई प्रतिष्ठित लोगों के नाम सामने आये। विकास पर कंगना ने तो विनीता नंदा ने आलोक नाथ पर आरोप लगाए। 





#metoo महिलाओं को एक मंच प्रदान करता है उन्हें अपने जैसी महिलाओं का साथ मिलता है और उन्हें एक बेहद ही घिनौने और खौफनाक आरोप को समाज के सामने लाने की हिम्मत देता है हालाँकि भारत में इसके लिए पहले से ही क़ानून बने हैं। कार्य स्थल पर सहकर्मियों द्वारा यौन उत्पीड़न के विरुद्ध   रोकथाम,निषेध, और निवारण अधिनियम 2013 में ऐसे प्रावधान दिए गए हैं। साथ ही महिलाएं धारा 354 (A) के तहत भी मुक़दमा कर सकती हैं। इस क़ानून के बावजूद महिलाएं किसी के खिलाफ इस तरह का आरोप लगाने की अक्सर हिम्मत नहीं कर पाती। ऐसे में #metoo कैंपेन महिलाओं का साथ देता है और इस साथ से उन्हें साहस मिलता है। अतः अपने आप में यह एक सराहनीय कदम है। और इसी वजह से इससे जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। हालाँकि इस मंच का दुरूपयोग होने की भी संभावना जताई जा रही है किन्तु यह जांच का विषय है फिर भी महिलाओं के हित को देखते हुए यह एक अच्छी पहल और सार्थक कदम है। 

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