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Success-the necessity of life


सफलता - एक ऐसा शब्द जिसके पीछे दूनिया  पागल है। कौन नहीं सफल होना चाहता है ? हर कोई शिखर पर जाना चाहता है। हर कोई अपने समाज, दोस्तों, सहकर्मिओं से आगे निकलना चाहता है। आखिर क्यों न हो , सफलता का नशा ही कुछ ऐसा होता है।;एक सफल व्यक्ति के पास सब कुछ होता है नाम, पैसा , सम्मान , रुतबा , सुरक्षा इत्यादि। वास्तव में प्रकृति भी वही चाहती है। इस दुनिआ में वही जीवित रह सकता है जो इस दूनिया में रहने योग्य हो। कमजोर , बीमार, अशक्त लोगों को प्रकृति पहले नष्ट करती है। जीवन की मूल भूत आवशकताएँ  जैसे रोटी , कपड़ा , मकान , हवा , पानी , दवा वह कैसे जुटाता है ईमानदारी से या बेईमानी से , मेहनत से या चोरी से , लूट के , दूसरों को हँसा के या दूसरों को रूला के , प्रकृति को इससे कोई मतलब नहीं , जिन्दा वही रहेगा जिसके शरीर में अन्न पानी जायेगा।  जीवित वही रहेगा जो मूल भूत  अवश्यकताओं को जुटाने में सफल होगा। दया,पुण्य ,पाप नाम की कोई चीज प्रकृति में नहीं है यदि होती तो शेर शाकाहारी हो गए होते। यह कटु सचाई है और इसे हम स्वीकारें या न स्वीकारें हमारी मर्ज़ी। यही कारण है चारों ओर होड़ मची है , गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है और बहुत से लोग टांग खींचने में लगे हैं। समाज समाज न रह के रेसकोर्स बन गया है।ईमानदारी, सहयोग और सह अस्तित्व म्यूजियम की चीज हो गयी है।रिश्ते नाते , परिवार , दोस्त , गुरु सब इस्तेमाल की चीजे हो गयी हैं। फायदा है तो रिश्ता है नहीं तो जय राम जी की। रिश्ते निभाए भी इसी शर्त पर जा रहे हैं।  शादियो में लोग इसी शर्त या उम्मीद पर जा रहे हैं कि वो भी हमारे घर की  शादी में आएंगे। मृत्य में भी लोग पहले ये याद करते हैं कि वो हमारे दुःख मे आया था या नहीं तब जाते हैं।  बीमारी में लोग मरीज को देखने कम और अपने को दिखाने ज्यादा जाते हैं कि  देखो मै तुम्हारे दुःख की घडी में  आया था। लोग सेलेक्टिव हो गए हैं। 
सामाजिक बदलाव को हमें स्वीकारना होगा।  यह एक सतत प्रक्रिया है।  नैतिक शिक्षायें , सत्संग , उपदेश , प्रवचन सब के सब बेअसर हो गयी हैं।  इस परिवर्तन को न हम रोक सकते हैं और न सुधार सकते हैं।  वास्तव में हम रोकना भी नहीं चाहते।  बच्चे , नागरिक और समाज का चरित्र कैसा होगा यह माँ पर निर्भर करता है। 
जो भी हो सफलता बहुत ही अच्छी चीज है  या यो कहें अनिवार्य चीज है अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए। हम उसके तरीकों की बात नहीं कर रहें हैं क्योंकि भरोसा , ईमानदारी , सहयोग सब आदर्शवादी बातें हैं जो सुनने में पढ़ने में अच्छी लगती हैं व्यव्हार में बहुत कम लोग ही लाते  हैं। यह आप पे डिपेंड करता है आप सफल होने के लिए कौन सा तरीका अपनाते हैं और लोग आपको कौन सा तरीका इस्तेमाल करने देते हैं। क्योंकि यदि आप बेईमानी करते हैं धोखा देते हैं तो आपके साथ भी कोई वही कर सकता है या लोग इतने सचेत हों कि आपको ऐसा करने ही न दें। धोखे ,बेईमानी से मिली सफलता का जो भी परिणाम हो , आप ये तभी कर सकते हैं जब समाज आपको ऐसा करने देता है। 
कॉम्पिटिशन हर जगह है जन्म के पहले भी और जन्म के बाद भी।  जी हाँ अधिकांश जानवरों में मादाएं उन्हीं नरों के साथ संसर्ग करती हैं जो अपने साथी नरों में सर्वश्रेष्ठ और बलशाली हो  उसे पाने के लिए उन्हें हरा चूका हो। फिर सीमेन के स्पर्म्स  में भी होड़ लगती है और जो सबसे पहले मादा के अंडाणु के पास पहुँचता है वही उसे निषेचित कर पता है। बाकि सब नष्ट हो जाते हैं। जानवर कई अंडे या बच्चे देते हैं और उसमे से वही बचता है या बड़ा होता है जो किसी तरह से अन्य को पछाड़ दिया हो।  कुल मिला कर अपना वंश बढाने के लिए आपको जीतना  होगा। स्पर्म्स में भी जो सबसे आगे जाने में सफल होता है उसी का अंश जन्म लेता है।
यानि हर हाल में आपको सफल होना होगा और हर पल आपको दूसरों से आगे निकलना होगा।  यही जीवन है यही जीवन की गतिशीलता है।  जिस दिन आप लड़ना छोड़ दिए , हराना छोड़ दिए आप पीछे रह जायेंगे और नष्ट हो जायेंगे।

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