Skip to main content

Meri Maa


आज  खाने बैठा तो पत्नी ने बताया अचार खत्म हो गया है तब अचानक मुझे अहसास हुआ खाने में वह स्वाद ही नहीं है वही स्वाद जिसका मै बचपन से दीवाना था मुँह फीका हो गया। आज माँ को गए दो साल हो गए फिर भी उनके हाथो से बनाये हुए अचार आज तक खा रहा था। उनके हाथों में जादू था शायद इसीलिए दो सालों उनके हाथो के बने अचार का स्वाद लेता रहा। शायद मायें जानती है इसी लिए भरपूर अचार रहने के बावजूद वे हर साल इसे बनाती है।
दिखने में तो वह बहुत ही साधारण सी महिला थी पर पता नहीं क्यों मुझे वह दुनियां में वह सबसे खूबसूरत दीखती थी। उनका प्यार से सर पे हाथ फेरना, प्यार से गले लगाना थपकी देना मुझे लगता था जैसे संसार का सबसे किस्मत वाला प्राणी मै ही हूँ। मुझे अकसर लगता था कि माँ मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है पर बाद में मेरा यह भ्रम टूट गया जब मै देखा कि वह बहनो के लिए भी उतना ही रोती हैं।
लेकिन माँ का एक रूप और भी था। वह सख्त अनुशाशनप्रिय थीं। उनके सामने हम कोई भाई बहन गाली या कोई भी अपशब्द किसी को नहीं कह सकते थे। यहाँ तक उनके पीठ पीछे भी नहीं क्योंकि कोई न कोई चुगली कर देता था। पढाई के प्रति वह बड़ी ही सख्त थीं। मेरा अकसर स्कूल जाने का मन नहीं करता था।  बहुत बार मार खाया हूँ उनसे इसको लेकर। आज सोचता हूँ अगर वो इतना सख्त नहीं होती तो मै क्या होता।
मुझसे वे बड़ी ही उम्मीदे पाल रखी थीं। और उनकी उम्मीदे हर समय बदलती रहती थीं। एक बार मेरे पड़ोस में एक मेहमान आये। वे रेडियो के अच्छे मकेनिक थे। उन्होंने पडोसी के ख़राब रेडियो को पल भर में बना दिया। उस ज़माने में रेडियो बड़ी चीज़ होती थी। मेरी माँ घर आयी और बोली तुम पढ़ाई के साथ साथ मकेनिक का भी काम सीख ले, इज़्ज़त भी है पैसा भी है। फिर एक दिन जब उनका सामना एक नौजवान डॉक्टर से हुआ तो उनके सपने बदल गए। अब वह चाहती थी मै डॉक्टर बनू। एक बार उन्हें किसी काम से किसी बड़े ऑफिस में जाना हुआ वहां उन्होंने उस अधिकारी के ठाट देखे सारे अन्य कर्मचारी उसके आगे पीछे एक पैर पे खड़े थे। घर आकर उन्होंने कहा काश मेरा भी लड़का कोई बड़ा अधिकारी बनता। 
हमारे घर पर सब उन्हें मोतिहारी वाली चाची कहता , कालोनी में सब उन्हें गीता की अम्मा पुकारते तो नानी उन्हें सुरसातो (सरस्वती) कह कर पुकारती। हम उन्हें अम्मा कह कर बुलाते। काफी बाद में लोग उन्हें डब्बू की अम्मा कहने लगें और जब मेरी बेटी हुई तो अड़ोस पड़ोस वाले उन्हें इशू की दादी कह कर बुलाने लगे। 
सिनेमा देखना उनको बहुत पसंद था। राजेंद्र कुमार उनके फेवरेट हीरो थे और फिल्म मेरे हमसफ़र का वह गीत  " किसी राह में किसी मोड़ पर" उनका फेवरिट गाना था। टीवी पर जब भी वह गाना चलता हो चैनल बदलने नहीं देती। वह अक्सर मैटनी शो में पिक्चर देखने जाती। हर हफ्ते कॉलोनी की महिलाओं का गुट बनता था और फिर दो तीन रिक्सों में अड़ोस पड़ोस की चाचियों और दीदीओं के साथ किसी न किसी सिनेमा हॉल पर धावा बोला जाता।  उन दिनों मनोरंजन के कोई साधन न होने की वजह से सिनेमा हॉलों में भीड़ बहुत होती थी। उस भीड़ में टिकट कटा लेने वाली महिला किसी झाँसी की रानी से कम नहीं मानी जाती थी। हमारे पड़ोस में रहने वाली नीलम दीदी अकसर यह रोल निभाती थीं। टिकट खिड़की पर पूरी ताकत के साथ पचासों महिलाओं के बीच में से पहुंच जाना और टिकट ले लेना वास्तव में मैडल जीतने के बराबर माना जाता था। बीच बीच में कई पुरुष भी असीम चतुराई दिल के अंदर लिए हुए तथा चेहरे पर मासूमियत लिए हुए मिन्नते करने लगते थे दीदी एक मेरा टिकट ले लो , आंटी जी बस एक टिकट मेरे लिए ले लो पैर में तकलीफ है इसलिए लाइन में खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ। दीदी मन ही मन गाली देती जब पैर में तकलीफ है तो पिक्चर देखना जरुरी है ? जो भी हो हम बच्चे जिद कर के साथ में पिक्चर देखने जरूर जाते। एक बार की बात है माधव टाकीज में पिक्चर लगी थी लावारिस। उन दिनों अमिताभ की तूती बोलती थी। खैर हम पहुंचे माधव टाकीज तो देखते हैं कि कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। जैसे तैसे जगह बना कर महिला मंडली अंदर पहुंची और झाँसी की रानी ने फिर अपना कमाल दिखाया। हमारी मंडली को टिकट मिल गए। खैर जब हम अंदर पहुंचे तो देखे पूरी सीट भरी हुई है। कोई भी एक जगह खाली नहीं थी। सिनेमा हॉल वालों ने सीट से ज्यादा टिकटे काट दी थीं। अब तो बड़ी मुश्किल हुई पुरे तीन घंटे खड़े होकर पिक्चर कौन देखेगा ?अब हमारी माँ ने गुस्सा दिखाया उन्होंने टिकट चेक करने वाले को जो डांटा कि वह मैनेजर को लेके आ गया। माँ ने उसे भी खूब सुनाया। मैनेजर ने हाथ जोड़ लिए और फ़ौरन अलग से बेंच और कुर्सियों का इंतजाम किया। चुकि इस बीच पिक्चर चालू हो चुकी थी अतः हम बच्चे सारे झगड़े छोड़ खड़े खड़े पिक्चर का मजा ले रहे थें।
हमारी माँ को सिलाई कढ़ाई और स्वेटर बुनने में महारथ हासिल था। नयी नयी और यूनिक डिजाइनों की लाइब्रेरी उनके दिमाग में रहती थी। शादी के पहले साल पिता जी द्वारा खरीदी हुई उषा कंपनी की सिलाई मशीन तो जैसे उनकी सहेली ही थी। अपने आखरी समय तक उन्होंने इस सिलाई मशीन से काम लिया। आज वह सिलाई मशीन पचास साल की हो गयी है और आज भी हमारे साथ माँ की अमानत के रूप में हमारे घर में मौजूद है। इस मशीन की छोटी मोटी खराबियां तो वह खुद ही बना लिया करती थीं। स्वेटर बुनने का भी उनको बड़ा शौक था। कोई भी डिजाइन ट्रैन में, मेले में, किसी की शादी में किसी के स्वेटर में बस एक बार देखा और उनकी आँखों में स्कैन हो गया। घर आ कर उस डिज़ाइन का नमूना बना कर सहेज कर रख लेती थीं वह। इसके साथ ही कई डिजाइन तो उन्होंने अपने क्रिएटिविटी से इज़ाद किये। क्वार्टर पर रोज़ लड़कियों और महिलाओं का हुजूम लगा रहता था। कोई दस्ताने बनाना सीखता तो किसी को कोई यूनिक डिज़ाइन चाहिए होती थी। डिज़ाइनों के लिए तो दूर दूर से महिलाएं आती थीं और साथ में यह भी रिक्वेस्ट रहती थी चाची या भाभी यह डिज़ाइन हमें दे दीजिए और प्लीज किसी और में मत डालियेगा। माँ भी अपना वायदा निभाती थीं। एक तरह से पूरा का पूरा बुटीक चलता था हमारे घर में। इसकी वजह से माँ हमें समय नहीं दे पाती। मै सोचता हूँ माँ आज के दौर में होती और अपनी व्यावसायिक बुद्धि लगाती तो अच्छा ख़ासा इनकम कर सकती थीं।
माँ बहुत ही धार्मिक स्वभाव की थीं। कोई भी धार्मिक आयोजन उनसे छूट नहीं सकता था। दरवाजे पर कोई भिखारी खाली हाथ वापस नहीं जा सकता था। ब्राह्मणो के भोजन के लिए घर में अलग बरतन होते थे। तीर्थ यात्रा ले जाने वाले पंडित जी हर साल अपनी बस में उनका टिकट उनसे बिना पूछे ही बुक कर दिया करते थे। मुझे याद है जब मै छोटा था उन दिनों माँ गुरुवार और शुक्रवार दोनों व्रत एक साथ किया करती थीं। गुरुवार में तो हमें मज़ा आता था , शाम को बेसन का हलवा मिलता था पर शुक्रवार को प्रॉब्लम होती थी। हम सबको सख्त हिदायत हुआ करती थी घर या बाहर कुछ भी खट्टा नहीं खाना है। किसी ने कोई व्रत त्यौहार के बारे में बता दिया तो वह व्रत करना शुरू कर देती थीं। छठ पहले हमारे घर में नहीं हुआ करता था पर बाद में वे उसे करने लगी। इधर कई सालों से वे हर शिव चर्चा में बिना नागा पंहुचा करती थी। मन्नतें उनकी पता नहीं कोई पूरी होती थी या नहीं पर मज़ाल है उनकी आस्था तनिक भी कम हो जाये। धैर्य तो उनमे खूब भरा था। दस साल से ऊपर तक बड़े बेटे की बीमारी में सेवा करने के बाद मौत और फिर करीब पांच साल अपने पति की पक्षाघात में सेवा करने के बाद भी उनको नहीं बचा पाना उन्हें अंदर ही अंदर काफी गहरा घाव तो दिया था फिर भी न तो उनकी आस्था कम हुई और न धैर्य।  यहाँ तक कि वह मज़ारों पर भी हम लोगों की सलामती और खुशहाली के लिए जाती थीं। चुकि मेरी आस्था धर्म वगैरह में बहुत कम है अतः कई बार मुझसे उनकी तकरार भी हो जाया करती  थी।
मेरी माँ को खाने पीने का बहुत शौक था। तीखे और मसालेदार खाने उनकी कमजोरी थे। चोखा, भुजिया, खिचड़ी को तो वह दूर से ही नापसंद कर देती थीं। कढ़ी बरी, मछली, साग के नाम से उनके मुँह में पानी आ जाता था। खाने के शौक के साथ साथ वह एक बहुत अच्छी कुक भी थीं। मीट और मछली बनाने में उन्हें महारत हासिल था। होली पर उनके बनाये हुए दही बड़े और मालपुए खाने तो पुरे कालोनी के लोग आते थे। गुझिया की डिजाइन और स्वाद लोग कई कई दिन तक चर्चा करते थें। उस ज़माने में जब पनीर मार्किट में आज की तरह सरलता से नहीं मिलता था उस जमाने में वह घर पर ही दूध को फाड़ कर पनीर बनाती थीं। एक बार रात में सबके खाना खा लेने के बाद कुछ मेहमानों का आना हुआ। दुर्भाग्य से घर में आलू और टमाटर को छोड़ कोई सब्ज़ी नहीं थी।  रात के साढ़े नौ बज चुके थे सब्ज़ी की दुकाने भी बंद हो चुकी थीं। माँ ने झट आलू और टमाटर की सब्ज़ी बनायीं और पराठे के साथ मेहमानो को परोस दी। बाद में जाते समय उन लोगों ने उस सब्ज़ी की पूरी रेसिपी माँ से एक कागज़ पर लिखवाई। मै खुद उस सब्ज़ी को चखा था आज तक मुझे उस सब्ज़ी का स्वाद याद है।
हमारी माँ पूरी की पूरी डॉक्टर भी थी। जब हम छोटे थे तो किसी भी भाई बहन को छोटा या बड़ा फोड़ा हुआ होता था और डॉक्टर दवा देता देता थक जाता था तो वह उसे एक दिन में ठीक कर देती थीं। वह जबरदस्ती हमारे हाथ पैर अपने पैरों के नीचे दबा कर उसे फोड़ के बहा देती थी और सेप्ट्रान या कोई दवा बुक कर उस पर लगा देती थी और फोड़ा अगले रोज सुख जाता था। सरदी जुकाम में वह हमारे सर की और पैर के तलवों की सरसों के तेल से ऐसी जबरदस्त मालिश करती थीं कि लगता था कि बीमारी आधी हो गयी है। उनकी डिस्पेंसरी उनके दिमाग में होती थी। ठंडी लगने पर जवाइन की सेंक या जवाइन की चाय हो या खांसी होने पर प्याज देसी घी में भून कर पेस्ट बना कर देना आदि सब उनके देसी नुस्खों में शामिल थें। इसके अलावा कई तरह काढ़े, नीम की पत्ती, मेथी के लड्डू, शरीफे की पत्ती और भी न जाने क्या क्या। चेहरे के लिए मुल्तानी मिटटी, हल्दी, एलोवेरा का जूस तो बालों के लिए दही, नीबू , मिटटी, बेसन। आखरी समय में जब उन्हें शुगर हुआ तो उनके एक्सपेरिमेंट और बढ़ते गए। रोज कोई न कोई पत्ती या जड़ या पेड़ की छाल लाती, उसे या तो ऐसे ही खा जाती या पानी में फुला कर या पका कर। अफ़सोस कोई काम न आया। 
माँ बहुत ही भोली थी। दूसरों के लिए वह अपनी जान भी निकाल के रख देती थी। बस जरुरत थी उनके सामने अपनी मज़बूरी इमोशनल अंदाज में रखने की। वो अपना काम धाम छोड़ कर उसकी मदद में लग जाती थीं। उस समय वो हम लोगों की एक न सुनती थी। कोई अपना काम ले के आ गया तो फिर वह दिन भर उसी में लग जाती। चाहे वह स्वेटर में नया डिज़ाइन डलवाने या सिखने आयी हो या सिलाई के लिए या फिर अपनी बहु का रोना लेकर। उनलोगों के साथ बैठने में  माँ अक्सर अपने दोपहर के खाने को भी टाल देती थी और उनके जाने के बाद अक्सर शाम के पांच बजे छह बजे खाती थीं। हम जब गुस्सा होते तो वो अकसर कहती मै तो बदलने वाली नहीं हाँ मेरे मरने के बाद तुम किसी को घर मत बुलाना आराम से और सुकून से रहोगे।
बहुत दिनों की बात है एक बार पुरे भारत में अफवाह उड़ी कि गणेश भगवान् दूध पी रहे हैं। उन दिनों हमारी कालोनी में एक गणेश महतो रहते थे और वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। शाम के वक्त जय प्रकाश भैया बाजार जाते हुए माँ से मिले तो उन्होंने माँ को बताया चाची गज़ब हो गया गणेश जी आज दूध पी रहे हैं। माँ ने सुना और आनन् फानन में पड़ोस की एक चाची को लेकर गणेश महतो के घर पहुंच गयी और पूछने लगी कैसे हुआ तबियत ज्यादा तो नहीं बिगड़ गयी कि अब खाना नहीं खा पा रहे हैं और दूध पर हैं। जब उन लोगों ने बताया कि ऐसी कोई बात नहीं है गणेश जी ठीक हैं और यह अफवाह गणेश भगवान् के बारे में है तो उनकी जान में जान आयी और फिर वो मंदिर की ओर गयी गणेश भगवान् को देखने। घर आकर जब उन्होंने यह वाकया हमें सुनाया तो हँसते हँसते हमारी हालत खराब हो गयी।
एक बार इसी तरह हमारे घर में एक पंडित जी आये हुए थे। पंडित जी बड़े ही पहुंचे हुए माने जाते थे। घर में वे माँ को सामने बिठाकर मन्त्र का जाप कर रहे थे। अचानक उसी समय भूकंप के झटके आये। मेरी पत्नी ऊपर के कमरे से चिल्ला कर बोली भागो भूकंप आया। पंडित जी ने सुना तो झट वे भाग खड़े हुए। लेकिन माँ आँख बंद कर बैठी थी मेरी पत्नी ने उन्हें उठाया और लेकर बाहर भागी। बाद में स्थिति सामान्य होने पर हम लोग घर वापस आये। हमने माँ से पूछा कि क्या उन्हें झटके नहीं महसूस हो रहे थे तो उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि पंडित जी के मन्त्रों की वजह से उनके शरीर में कोई भूत प्रेत प्रवेश कर गया है और वही उन्हें हिला रहा है।
अनगिनत यादें हैं लिखूं तो पूरी किताब बन जाये। माँ सबकी यूनिक होती है विचित्र होती है मासूम होती है वह सबको समझती है उसको कोई नहीं समझ पाता है। 

Comments

Popular posts from this blog

Nirav Modi and Punjab National Bank Scam

Nirav  Modi   , एक ऐसी शख्सियत जो आज अखबारों  और न्यूज़ चैनलों की हेड लाइन बना हुआ है, बैंकों  और खासकर पंजाब नेशनल बैंक की गले की हड्डी बना हुआ है  आखिर है कौन ? आखिर क्यों उसने भारत सरकार  की नींद उड़ा  दी और बैंको की साख पर बट्टा लगा दिया।  तो आइये चलते हैं  आज  जानते हैं कि  आखिर  Nirav  Modi  कौन है और उसने ऐसा कौन सा कारनामा कर दिया है। 
Nirav  Modi  वही शख्स है जिसने भारत के इतिहास में सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम दिया है। घोटाला भी ऐसा वैसा नहीं पुरे 1.8 बिलियन डालर यानि करीब करीब 11400 करोड़ रुपये का। मजे की बात यह है की यह घोटाला पंजाब नेशनल बैंक की एक ही शाखा मुंबई में हुआ। 
Nirav  Modi एक ग्लोबल ज्वेल्लरी हाउस है जिसकी स्थापना नीरव मोदी ने 2010 में की थी। नीरव मोदी ज्वेल्लरी हाउस भारत का पहला ज्वेल्लरी हाउस है जो Cristie  and Sotheby Catalogues में अपना स्थान बनाया था।  मोदी के पिता और दादा दोनों इसी व्यसाय में थे।  नीरव का पालन पोषण Antewerp Belgium में हुआ था। उनकी शादी Ami Modi  से हुई थी और उनके तीन बच्चे हैं। उनके छोटे भाई nishat की शादी Mukesh  Ambani  की भतीजी  इशिता…

Uric Acid: Lakshan Aur Niyantran Ke Upay Hindi Me

यूरिक एसिड और गाउट /अर्थराइटिस  

कई बार ऐसा होता है कि कुछ लोगों को चलने फिरने में काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है और उनके शरीर के जोड़ जोड़ में दर्द होता है। गांठे सूज जाती हैं और वह करीब करीब बेड पर हो जाता है। यह बीमारी काफी तकलीफदायक है क्योंकि यह सीधे मनुष्य के खड़े होने , चलने फिरने पर प्रभाव डालता है और इस वजह से वह लाचार और काफी हद तक दूसरों पर निर्भर हो जाता है। 
आइए जानते हैं ऐसा किन वजहों से होता है और कैसे इसका निदान करते हैं : मनुष्य के शरीर में विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के पश्चात यूरिक एसिड का निर्माण होता है। जब किसी कारणवश शरीर में इसकी मात्रा बढ़ जाती है तब यह शरीर पर अपना नुकसान दिखाना शुरू करती है।  यूरिक एसिड या गठिआ क्या है What is Uric Acid
यूरिक एसिड कार्बन,हाइड्रोजन,नाइट्रोंजन तथा ऑक्सीजन परमाणुओं का एक हेट्रोसिक्लिक योगिक होता है जो शरीर के अंदर विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के पश्चात् प्यूरिन के रूप में उत्पन्न होता है।इसी प्यूरिन के टूटने से यूरिक एसिड का निर्माण होता है।  जब हमारे शरीर में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है तो इसे Hyperuricemia या सामान्य बोलचाल में …

Diabetes Ya Madhumeh Kya Hai

आज कम्पटीशन,टारगेट और टेंशन की जिंदगी ने हमारे लाइफ स्टाइल को काफी बदल के रख दिया है। जीवन के इस बदलाव और आरामतलब जिंदगी ने कई बीमारीओं को जन्म दिया है। जिसमे से एक है डायबिटीज या मधुमेह। आज भारत में करीब 70 मिलियन लोग diabetes से ग्रस्त हैं। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है पर बहुत से खतरनाक रोगों का जनक है। 
डायबिटीज या शुगर क्या है 

Diabetes वास्तव में हमारे रक्त में शुगर की मात्रा सामान्य स्तर से बढ़ने की स्थिति को कहते हैं। यह स्थिति तब आती है जब हमारे शरीर में पाचन के उपरांत बने ग्लूकोस का अवशोषण कोशिकाओं के द्वारा नहीं हो पाता। रक्त में मौजूद यह शुगर हमारे कई अंगों को डैमेज कर देता है। कई बार हमें तब पता चलता है जब काफी नुकसान हो चूका होता है। यही वजह है कि इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है। 
हमारे शरीर में सामान्य शुगर लेवल क्या होना चाहिए 

हमारे शरीर में सामान्य अवस्था में शुगर लेवल खाली पेट 70 से 100 mg /dl होना चाहिए जबकि खाना खाने के बाद 120 से 140 mg /dl  जब हमारे रक्त में शुगर लेवल इससे अधिक हो तो इसे diabetes या सामान्य बोलचाल में शुगर होना कहते हैं। 
डायबिटीज के लक्षण 

डायबिटी…