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August 15, 2018

Meri Maa


आज खाने बैठा तो पत्नी ने बताया अचार खत्म हो गया है तब अचानक मुझे अहसास हुआ खाने में वह स्वाद ही नहीं है वही स्वाद जिसका मै  बचपन से दीवाना था मुँह फीका हो गया। आज माँ को गए दो साल हो गए फिर भी उनके हाथो से बनाये हुए अचार आज तक खा रहा था। उनके हाथों में जादू था शायद इसीलिए दो सालों उनके हाथो के बने अचार का स्वाद लेता रहा। शायद मायें जानती है इसी लिए भरपूर अचार रहने के बावजूद वे हर साल इसे बनाती है।
दिखने में तो वह बहुत ही साधारण सी महिला थी पर पता नहीं क्यों मुझे वह दुनियां में वह सबसे खूबसूरत दीखती थी। उनका प्यार से सर पे हाथ फेरना, प्यार से गले लगाना थपकी देना मुझे लगता था जैसे संसार का सबसे किस्मत वाला प्राणी मै ही हूँ। मुझे अकसर लगता था कि माँ मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है पर बाद में मेरा यह भ्रम टूट गया जब मै देखा कि वह बहनो के लिए भी उतना ही रोती हैं।
लेकिन माँ का एक रूप और भी था। वह सख्त अनुशाशनप्रिय थीं। उनके सामने हम कोई भाई बहन गाली या कोई भी अपशब्द किसी को नहीं कह सकते थे। यहाँ तक उनके पीठ पीछे भी नहीं क्योंकि कोई न कोई चुगली कर देता था। पढाई के प्रति वह बड़ी ही सख्त थीं। मेरा अकसर स्कूल जाने का मन नहीं करता था।  बहुत बार मार खाया हूँ उनसे इसको लेकर। आज सोचता हूँ अगर वो इतना सख्त नहीं होती तो मै क्या होता।
मुझसे वे बड़ी ही उम्मीदे पाल रखी थीं। और उनकी उम्मीदे हर समय बदलती रहती थीं। एक बार मेरे पड़ोस में एक मेहमान आये। वे रेडियो के अच्छे मकेनिक थे। उन्होंने पडोसी के ख़राब रेडियो को पल भर में बना दिया। उस ज़माने में रेडियो बड़ी चीज़ होती थी। मेरी माँ घर आयी और बोली तुम पढ़ाई के साथ साथ मकेनिक का भी काम सीख ले, इज़्ज़त भी है पैसा भी है। फिर एक दिन जब उनका सामना एक नौजवान डॉक्टर से हुआ तो उनके सपने बदल गए। अब वह चाहती थी मै डॉक्टर बनू। एक बार उन्हें किसी काम से किसी बड़े ऑफिस में जाना हुआ वहां उन्होंने उस अधिकारी के ठाट देखे सारे अन्य कर्मचारी उसके आगे पीछे एक पैर पे खड़े थे। घर आकर उन्होंने कहा काश मेरा भी लड़का कोई बड़ा अधिकारी बनता। 
हमारे घर पर सब उन्हें मोतिहारी वाली चाची कहता , कालोनी में सब उन्हें गीता की अम्मा पुकारते तो नानी उन्हें सुरसातो (सरस्वती) कह कर पुकारती। हम उन्हें अम्मा कह कर बुलाते। काफी बाद में लोग उन्हें डब्बू की अम्मा कहने लगें और जब मेरी बेटी हुई तो अड़ोस पड़ोस वाले उन्हें इशू की दादी कह कर बुलाने लगे। 
सिनेमा देखना उनको बहुत पसंद था। राजेंद्र कुमार उनके फेवरेट हीरो थे और फिल्म मेरे हमसफ़र का वह गीत  " किसी राह में किसी मोड़ पर" उनका फेवरिट गाना था। टीवी पर जब भी वह गाना चलता हो चैनल बदलने नहीं देती। वह अक्सर मैटनी शो में पिक्चर देखने जाती। हर हफ्ते कॉलोनी की महिलाओं का गुट बनता था और फिर दो तीन रिक्सों में अड़ोस पड़ोस की चाचियों और दीदीओं के साथ किसी न किसी सिनेमा हॉल पर धावा बोला जाता।  उन दिनों मनोरंजन के कोई साधन न होने की वजह से सिनेमा हॉलों में भीड़ बहुत होती थी। उस भीड़ में टिकट कटा लेने वाली महिला किसी झाँसी की रानी से कम नहीं मानी जाती थी। हमारे पड़ोस में रहने वाली नीलम दीदी अकसर यह रोल निभाती थीं। टिकट खिड़की पर पूरी ताकत के साथ पचासों महिलाओं के बीच में से पहुंच जाना और टिकट ले लेना वास्तव में मैडल जीतने के बराबर माना जाता था। बीच बीच में कई पुरुष भी असीम चतुराई दिल के अंदर लिए हुए तथा चेहरे पर मासूमियत लिए हुए मिन्नते करने लगते थे दीदी एक मेरा टिकट ले लो , आंटी जी बस एक टिकट मेरे लिए ले लो पैर में तकलीफ है इसलिए लाइन में खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ। दीदी मन ही मन गाली देती जब पैर में तकलीफ है तो पिक्चर देखना जरुरी है ? जो भी हो हम बच्चे जिद कर के साथ में पिक्चर देखने जरूर जाते। एक बार की बात है माधव टाकीज में पिक्चर लगी थी लावारिस। उन दिनों अमिताभ की तूती बोलती थी। खैर हम पहुंचे माधव टाकीज तो देखते हैं कि कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। जैसे तैसे जगह बना कर महिला मंडली अंदर पहुंची और झाँसी की रानी ने फिर अपना कमाल दिखाया। हमारी मंडली को टिकट मिल गए। खैर जब हम अंदर पहुंचे तो देखे पूरी सीट भरी हुई है। कोई भी एक जगह खाली नहीं थी। सिनेमा हॉल वालों ने सीट से ज्यादा टिकटे काट दी थीं। अब तो बड़ी मुश्किल हुई   पुरे तीन घंटे खड़े होकर पिक्चर कौन देखेगा ?अब हमारी माँ ने गुस्सा दिखाया उन्होंने टिकट चेक करने वाले को जो डांटा कि वह मैनेजर को लेके आ गया। माँ ने उसे भी खूब सुनाया। मैनेजर ने हाथ जोड़ लिए और फ़ौरन अलग से बेंच और कुर्सियों का इंतजाम किया। चुकि इस बीच पिक्चर चालू हो चुकी थी अतः हम बच्चे सारे झगड़े छोड़ खड़े खड़े पिक्चर का मजा ले रहे थें।
हमारी माँ को सिलाई कढ़ाई और स्वेटर बुनने में महारथ हासिल था। नयी नयी और यूनिक डिजाइनों की लाइब्रेरी उनके दिमाग में रहती थी।शादी के पहले साल पिता जी द्वारा खरीदी हुई उषा कंपनी की सिलाई मशीन तो जैसे उनकी सहेली ही थी। अपने आखरी समय तक उन्होंने इस सिलाई मशीन से काम लिया। आज वह सिलाई मशीन पचास साल की हो गयी है और आज भी हमारे साथ माँ की अमानत के रूप में हमारे घर में मौजूद है। इस मशीन की छोटी मोटी  खराबियां तो वह खुद ही बना लिया करती थीं। स्वेटर बुनने का भी उनको बड़ा शौक था। कोई भी डिजाइन ट्रैन में, मेले में, किसी की शादी में किसी के स्वेटर में बस एक बार देखा और उनकी आँखों में स्कैन हो गया।  घर आ कर उस डिज़ाइन का नमूना बना कर सहेज कर रख लेती थीं वह। इसके साथ ही कई डिजाइन तो उन्होंने अपने क्रिएटिविटी से इज़ाद किये। क्वार्टर पर रोज़ लड़कियों और महिलाओं का हुजूम लगा रहता था। कोई दस्ताने बनाना सीखता तो किसी को कोई यूनिक डिज़ाइन चाहिए होती थी। डिज़ाइनों के लिए तो दूर दूर से महिलाएं आती थीं और साथ में यह भी रिक्वेस्ट रहती थी चाची या भाभी यह डिज़ाइन हमें दे दीजिए और प्लीज किसी और में मत डालियेगा। माँ भी अपना वायदा निभाती थीं। एक तरह से पूरा का पूरा बुटीक चलता था हमारे घर में। इसकी वजह से माँ हमें समय नहीं दे पाती। मै सोचता हूँ माँ आज के दौर में होती और अपनी व्यावसायिक बुद्धि लगाती तो अच्छा ख़ासा इनकम कर सकती थीं।
माँ बहुत ही धार्मिक स्वभाव की थीं। कोई भी धार्मिक आयोजन उनसे छूट नहीं सकता था। दरवाजे पर कोई भिखारी खाली हाथ वापस नहीं जा सकता था। ब्राह्मणो के भोजन के लिए घर में अलग बरतन होते थे। तीर्थ यात्रा ले जाने वाले पंडित जी हर साल अपनी बस में उनका टिकट उनसे बिना पूछे ही बुक कर दिया करते थे। मुझे याद है जब मै छोटा था उन दिनों माँ गुरुवार और शुक्रवार दोनों व्रत एक साथ किया करती थीं। गुरुवार में तो हमें मज़ा आता था , शाम को बेसन का हलवा मिलता था पर शुक्रवार को प्रॉब्लम होती थी। हम सबको सख्त हिदायत हुआ करती थी घर या बाहर कुछ भी खट्टा नहीं खाना है। किसी ने कोई व्रत त्यौहार के बारे में बता दिया तो वह व्रत करना शुरू कर देती थीं। छठ पहले हमारे घर में नहीं हुआ करता था पर बाद में वे उसे करने लगी। इधर कई सालों से वे हर शिव चर्चा में बिना नागा पंहुचा करती थी। मन्नतें उनकी पता नहीं कोई पूरी होती थी या नहीं पर मज़ाल है उनकी आस्था तनिक भी कम हो जाये। धैर्य तो उनमे खूब भरा था। दस साल से ऊपर तक बड़े बेटे की बीमारी में सेवा करने के बाद मौत और फिर करीब पांच साल अपने पति की पक्षाघात में सेवा करने के बाद भी उनको नहीं बचा पाना उन्हें अंदर ही अंदर काफी गहरा घाव तो दिया था फिर भी न तो उनकी आस्था कम हुई और न धैर्य।  यहाँ तक कि वह मज़ारों पर भी हम लोगों की सलामती और खुशहाली के लिए जाती थीं। चुकि मेरी आस्था धर्म वगैरह में बहुत कम है अतः कई बार मुझसे उनकी तकरार भी हो जाया करती  थी।
मेरी माँ को खाने पीने का बहुत शौक था। तीखे और मसालेदार खाने उनकी कमजोरी थे। चोखा, भुजिया, खिचड़ी को तो वह दूर से ही नापसंद कर देती थीं। कढ़ी बरी, मछली, साग के नाम से उनके मुँह में पानी आ जाता था। खाने के शौक के साथ साथ वह एक बहुत अच्छी कुक भी थीं। मीट और मछली बनाने में उन्हें महारत हासिल था। होली पर उनके बनाये हुए दही बड़े और मालपुए खाने तो पुरे कालोनी के लोग आते थे। गुझिया की डिजाइन और स्वाद लोग कई कई दिन तक चर्चा करते थें। उस ज़माने में जब पनीर मार्किट में आज की तरह सरलता से नहीं मिलता था उस जमाने में वह घर पर ही दूध को फाड़ कर पनीर बनाती थीं। एक बार रात में सबके खाना खा लेने के बाद कुछ मेहमानों का आना हुआ। दुर्भाग्य से घर में आलू और टमाटर को छोड़ कोई सब्ज़ी नहीं थी।  रात के साढ़े नौ बज चुके थे सब्ज़ी की दुकाने भी बंद हो चुकी थीं। माँ ने झट आलू और टमाटर की सब्ज़ी बनायीं और पराठे के साथ मेहमानो को परोस दी। बाद में जाते समय उन लोगों ने उस सब्ज़ी की पूरी रेसिपी माँ से एक कागज़ पर लिखवाई। मै खुद उस सब्ज़ी को चखा था आज तक मुझे उस सब्ज़ी का स्वाद याद है।
हमारी माँ पूरी की पूरी डॉक्टर भी थी। जब हम छोटे थे तो किसी भी भाई बहन को छोटा या बड़ा फोड़ा हुआ होता था और डॉक्टर दवा देता देता थक जाता था तो वह उसे एक दिन में ठीक कर देती थीं। वह जबरदस्ती हमारे हाथ पैर अपने पैरों के नीचे दबा कर उसे फोड़ के बहा देती थी और सेप्ट्रान या कोई दवा बुक कर उस पर लगा देती थी और फोड़ा अगले रोज सुख जाता था। सरदी जुकाम में वह हमारे सर की और पैर के तलवों की सरसों के तेल से ऐसी जबरदस्त मालिश करती थीं कि लगता था कि बीमारी आधी हो गयी है। उनकी डिस्पेंसरी उनके दिमाग में होती थी। ठंडी लगने पर जवाइन की सेंक या जवाइन की चाय हो या खांसी होने पर प्याज देसी घी में भून कर पेस्ट बना कर देना आदि सब उनके देसी नुस्खों में शामिल थें। इसके अलावा कई तरह काढ़े, नीम की पत्ती, मेथी के लड्डू, शरीफे की पत्ती और भी न जाने क्या क्या। चेहरे के लिए मुल्तानी मिटटी, हल्दी, एलोवेरा का जूस तो बालों के लिए दही, नीबू , मिटटी, बेसन। आखरी समय में जब उन्हें शुगर हुआ तो उनके एक्सपेरिमेंट और बढ़ते गए। रोज कोई न कोई पत्ती या जड़ या पेड़ की छाल लाती, उसे या तो ऐसे ही खा जाती या पानी में फुला कर या पका कर। अफ़सोस कोई काम न आया। 
माँ बहुत ही भोली थी। दूसरों के लिए वह अपनी जान भी निकाल के रख देती थी। बस जरुरत थी उनके सामने अपनी मज़बूरी इमोशनल अंदाज में रखने की। वो अपना काम धाम छोड़ कर उसकी मदद में लग जाती थीं। उस समय वो हम लोगों की एक न सुनती थी। कोई अपना काम ले के आ गया तो फिर वह दिन भर उसी में लग जाती। चाहे वह स्वेटर में नया डिज़ाइन डलवाने या सिखने आयी हो या सिलाई के लिए या फिर अपनी बहु का रोना लेकर। उनलोगों के साथ बैठने में  माँ अक्सर अपने दोपहर के खाने को भी टाल देती थी और उनके जाने के बाद अक्सर शाम के पांच बजे छह बजे खाती थीं। हम जब गुस्सा होते तो वो अकसर कहती मै तो बदलने वाली नहीं हाँ मेरे मरने के बाद तुम किसी को घर मत बुलाना आराम से और सुकून से रहोगे।
बहुत दिनों की बात है एक बार पुरे भारत में अफवाह उड़ी कि गणेश भगवान् दूध पी रहे हैं। उन दिनों हमारी कालोनी में एक गणेश महतो रहते थे और वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। शाम के वक्त जय प्रकाश भैया बाजार जाते हुए माँ से मिले तो उन्होंने माँ को बताया चाची गज़ब हो गया गणेश जी आज दूध पी रहे हैं। माँ ने सुना और आनन् फानन में पड़ोस की एक चाची को लेकर गणेश महतो के घर पहुंच गयी और पूछने लगी कैसे हुआ तबियत ज्यादा तो नहीं बिगड़ गयी कि अब खाना नहीं खा पा रहे हैं और दूध पर हैं। जब उन लोगों ने बताया कि ऐसी कोई बात नहीं है गणेश जी ठीक हैं और यह अफवाह गणेश भगवान् के बारे में है तो उनकी जान में जान आयी और फिर वो मंदिर की ओर गयी गणेश भगवान् को देखने। घर आकर जब उन्होंने यह वाकया हमें सुनाया तो हँसते हँसते हमारी हालत खराब हो गयी।
एक बार इसी तरह हमारे घर में एक पंडित जी आये हुए थे। पंडित जी बड़े ही पहुंचे हुए माने जाते थे। घर में वे माँ को सामने बिठाकर मन्त्र का जाप कर रहे थे। अचानक उसी समय भूकंप के झटके आये। मेरी पत्नी ऊपर के कमरे से चिल्ला कर बोली भागो भूकंप आया। पंडित जी ने सुना तो झट वे भाग खड़े हुए। लेकिन माँ आँख बंद कर बैठी थी मेरी पत्नी ने उन्हें उठाया और लेकर बाहर भागी। बाद में स्थिति सामान्य होने पर हम लोग घर वापस आये। हमने माँ से पूछा कि क्या उन्हें झटके नहीं महसूस हो रहे थे तो उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि पंडित जी के मन्त्रों की वजह से उनके शरीर में कोई भूत प्रेत प्रवेश कर गया है और वही उन्हें हिला रहा है।
अनगिनत यादें हैं लिखूं तो पूरी किताब बन जाये। माँ सबकी यूनिक होती है विचित्र होती है मासूम होती है वह सबको समझती है उसको कोई नहीं समझ पाता है। 

August 07, 2018

Teamwork

लता को गाते सुनता हूँ मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। रोम रोम झंकृत और प्रसन्न हो जाता है और मुँह से वाह वाह निकल पड़ता है। उनकी कला ,उनकी साधना ,उनकी मेहनत का कायल हो जाता हूँ। किन्तु फिर सोचता हूँ उस गीतकार के बारे में जिसने उस गीत की रचना की , उस संगीतकार के बारे में जिसने सुर दिए,धुन निकाली। क्या उनकी मदद के बिना उस गाने में उतना ही आनंद आता ? शायद नहीं। दोस्तों किसी भी सफलता के पीछे केवल वह सफल व्यक्ति नहीं होता बल्कि एक पूरी टीम होती है जो उसे उस मुकाम तक ले जाती है। कई बार व्यक्तिगत सफलताओं में भी जहाँ हमें लगता है कि अमूक व्यक्ति ने अमूक सफलता हासिल की है वहां भी गहन विश्लेषण किया जाय तो उसके पीछे उसके परिवार ,समाज ,कोच का कुछ न कुछ रोल समझ में आता है। मै उस व्यक्तिगत सफलता में उस व्यक्ति की कड़ी मेहनत को कम करके नहीं आंक रहा हूँ बल्कि उसकी प्रशंसा  करता हूँ और मानता हूँ कि उसकी मेहनत के बिना सफलता नहीं मिल सकती थी। एक युवक पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर लेता है बधाईओं का ताँता लग जाता है किन्तु जब उससे पूछा जाता है कि अपनी सफलता का श्रेय किसे देंगे तो वह अपने माँ बाप , पत्नी , दोस्त और न जाने किसका किसका नाम लेने लगता है। बात सही भी है उसने मेहनत की किन्तु पत्नी,माँ बाप,दोस्त ने मेहनत के लिए माहौल बनाया ,प्रेरणा और हौसला दिया। समय पर खाना बनाकर देना कपडे धुलना , अपने साथ समय बिताने की जिद्द न करके एकांत माहौल प्रदान करना या बाहर तैयारी के लिए भेजना, खुद धैर्य रखना और धैर्य देना , बहुत सारे फैक्टर्स हैं। सफलता में इनका योगदान बहुत ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है। कई बार तिरस्कार के रूप में एक अलग तरह का सपोर्ट परिवार और समाज से मिलता है जो उसे सफलता की ओर ले जाती है। काली दास और तुलसी दास शायद अपनी ऊचाईओं को न छू पाते यदि उन्हें अपनी अपनी पत्निओं से तिरस्कार न मिला होता। बैट्समैन शतक बनाता है अच्छी बात है किन्तु उसके साथ तालियों का थोड़ा बहुत हक़दार उसका कोच और उसका जोड़ीदार बैट्समैन भी होता है जिसके बिना वह शायद मुश्किल होता। कहने का मतलब है कि हर सफलता के पीछे एक टीम होती है और टीमवर्क होता है। यानि सफल होना है तो आपकी टीम सही होनी चाहिए।

Linked Connected Network Team Teamwork Bla
दूसरे शब्दों में यदि आपको सफल होना है तो आपको एक अच्छी टीम बनानी होगी। कई बार यह बनी बनाई मिलती है तो कई बार खुद बनानी पड़ती है। ऊपर की चर्चा में कई उदाहरणों में टीम गौण और कम  महत्वपूर्ण दिखती है खासकर व्यक्तिगत सफलता में, तो भी हम उसे एकदम से इग्नोर नहीं कर सकते। तिरस्कार और उपहास वाले केस में कई लोग इसे टीम नहीं मानेंगे किन्तु चुकि  सफलता के लिए वह उत्प्रेरक का काम करते हैं और उसके बिना सफलता का प्रयास या तो नहीं होता या शिथिल होता और सफलता संदिग्ध होती अतः वे भी टीम का ही एक हिस्सा होते हैं।
टीम वर्क का सबसे अच्छा और सबसे पुराना उदहारण अमृत मंथन की कथा को मान सकते हैं जिसमे अमृत की प्राप्ति के लिए यानि एक महान उद्द्येश्य को प्राप्त करने के लिए देवता और दानव यानि दो शत्रुओं ने एक टीम का गठन किया और अन्य सदस्यों  रूप में शेषनाग और पर्वत का भी इस्तेमाल किया गया। यानि किसी महान उद्द्येश्य को प्राप्त करने के लिए आपको  शत्रुता , उच्च नीच , वैमनस्य सबको त्याग कर टीम के रूप में  काम करना होगा ,अपने अपने रोल को निभाना होगा। पौराणिक कथाओं में रामायण में भी टीमवर्क का एक बहुत ही बढियाँ उदहारण मिलता है जब राम को सीता का पता लगाने और लंका पर आक्रमण करने के लिए पूल बनाना था। राम ने  टीम बनाई जिसमे बन्दर, भालू ,पक्षी ,इंसान और गिलहरी सब थे। फिर इसी टीम ने सीता का पता लगाया और पूल बनाकर रावण को परास्त भी किया।
इन सब उदाहरणों से पता  कि किसी सफलता के लिए टीम कितना अहम् होती है। कई बार यह पहले से बनी बनाई मिल जाती है तो कई बार खुद हमें बनानी पड़ती है। कई बार यह परोक्ष रूप से बिना सामने आये हमारी मदद करती है।

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अतः हमें अपने लक्ष्य के हिसाब से एक टीम बनानी चाहिए जिसमे  सदस्यों का चुनाव उनकी योग्यता के अनुसार करना चाहिए। फिर काम की मॉनिटरिंग करना और उस उद्देश्य को प्राप्त करना चाहिए।  खेलों में हम टीम वर्क का अच्छा उदहारण पाते हैं कोई बैटिंग करता है तो कोई बॉलर है कोई फील्डिंग करता है तो कोई विकेटकीपिंग पर सबका बस एक ही उद्देश्य है टीम की जीत। हमेशा याद रखे आप खुद सब कुछ नहीं कर सकते किन्तु सब कुछ करा सकते। हैं। सरकार , बैंक , रेलवे ,अस्पताल या  कंपनी सभी टीम के रूप में ही काम  करते हैं। यहाँ तक हमारा समाज भी एक टीम की तरह ही होता है जिसमे कोई समाज के लिए अन्न उपजाता है तो कोई कपड़ा बुनता है कोई बर्तन बनाता  तो कोई ज्ञान बांटता है। काम तो सब अपना ही करते हैं किन्तु उसका प्रभाव व्यापक रूप से पुरे समाज पर पुरे देश पर पड़ता है। अतः किसी ने अपने काम में लापरवाही की तो उसका तो नुकसान होता ही है साथ ही पुरे समाज का भी नुकसान होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि हम एक दूसरे के पूरक हैं। 

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July 30, 2018

Mob Power And Mob Lynching



विकास  की इस अंधी दौड़ में जो भागमभाग मची है उसमे हमारे सभ्य होने की रफ़्तार को बड़ा  नुकसान पहुंचाया है। बल्कि सचाई तो यह है  कि  हम जितना ही विकास की ओर आगे निकले उतना ही हम सभ्यता के मामले पिछड़ गए हैं। मकान बड़े होते गए और हमारे दिल छोटे। बाजार को मॉलों और ऑनलाइन बाजारोँ  ने निगल लिया है। बैंकों ने किसानों को मजदूर बना दिया तो मशीनों ने मजदूरों को परदेसी बना दिया।विज्ञान ने मृत्यु दर को कम किया तो जिंदगी ने संसाधनों को। जनसँख्या का भार न केवल हमारे अवसरों को कम किया है बल्कि हमारे लिए एक बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहा है। जिन नवयुवकों को अपनी ऊर्जा अपने परिवार के लिए अपने देश के लिए लगानी चाहिए वो अपनी ताकत सडकों पर दिखा रहे हैं। और क्यों नहीं ऊर्जा तो कहीं संचित नहीं होगी वो तो या तो निर्माण करेगी या विनाश करेगी। चारों ओर  निराशा है हताशा है लोग जी तो रहे हैं पर शायद जिंदा नहीं हैं। स्कूल है पर शिक्षक नहीं, हॉस्पिटल हैं पर डॉक्टर नहीं, न्यायलय है पर न्यायधीश नहीं। एक एक मुकदमे को निपटने में नयी पीढ़ी जवान हो जाती है। न्याय मिलने में इसी देरी का लाभ उठा कर तथा अन्य व्याप्त भ्रष्टाचारों का लाभ उठाकर अपराधी मौज़ करते हैं और छूट जाते हैं जबकि पीड़ित के हाथ लगती है निराशा। यह निराशा केवल पीड़ित को अवसादग्रस्त नहीं करती बल्कि पूरे समाज को तोड़ देती है। आक्रोशित कर देती है, गुस्से से भर देती है। यह स्थिति लोगों का न्यायलय पर से भरोसा कम करती है। स्थिति कितनी भयावह है इसका अंदाज़ा इन आकड़ों से लगाया जा सकता है। देश में करीब 3.30 लाख किसानों ने कर्ज की वजह से आत्महत्या कर ली है, करीब एक साल में 34651 महिलाओं और बच्चों से 13766 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं  करीब 7 करोड़ लोग बेरोजगार हैं तो करीब 19.5 करोड़ लोग भूखे सोते हैं साढ़े छह करोड़ बच्चे कुपोषित हैं करीब एक प्रतिशत लोगों के पास साठ प्रतिशत सम्पति है और करीब छह करोड़ लोग निराशा के शिकार है।  न्यायालयों की स्थिति तो और भी बुरी है करोड़ो मुकदमे लंबित पड़े हुए हैं सुनवाई के लिए। पुलिस प्रशाशन की स्थिति ऐसी है कि अपराध की सूचना मात्रा दर्ज कराने में पसीने आ जाये। आज हम ऐसी स्थिति में जी रहे हैं जहाँ लोग पुलिस के आने से राहत के बजाय भय महसूस करते हैं। लोग कुंठित हैं, हताश हैं, निराश हैं, परेशान हैं आक्रोश में हैं गुस्से में हैं, भ्रमित हैं।  समाज में बारूद भरा हुआ है बस पलीता लगाने की देर है। ऐसे निराशा से भरे हुए, बेरोजगार या अपर्याप्त रोजगार वाली असंतुष्ट भीड़ किसी बम से कम नहीं होती। अब इसमें धर्म की कट्टर सोच की चिंगारी लगा दी जाये या राजनीती का पलीता लगा दिया जाये चाहे आरक्षण के समर्थन के नाम पर या उसके विरोध के नाम पर गाय के नाम पर चाहे सूअर के नाम पर, इसका फटना तो तय है। अब इस स्थिति का लाभ उठाकर कुछ लोग अपना एजेंडा चलाने लगते हैं। निराश,हताश और अवसादग्रस्त लोगों की इस भीड़ की इस विशाल शक्ति का लाभ उठाकर वे अकसर कानून और व्यवस्था की धज़्ज़ी उड़ाते हैं। फिर चाहे वह राम रहीम की गिरफ़्तारी का प्रकरण हो या गुजरात और हरियाणा में आरक्षण आंदोलन की आड़ में तोड़ फोड़ और दंगा फसाद हो , हर जगह इस पागल हाथी के सामान भीड़ के गुस्से को देखा गया। भीड़ तंत्र की इस शक्ति को कुछ लोगों ने पहचाना और इस भीड़ की शक्ति का प्रयोग अपने लाभ के लिए करने लगे। कुछ लोग तो इसी भीड़ तंत्र की आड़ में अपने ही लोगों द्वारा कुछ ख़ास लोगों को टारगेट कर के मार देते  हैं। या तो फिर भीड़ को नफरत की आग में खूब पकाते हैं और भीड़ अपना काम कर देती है।  अब चाहे गाय के नाम पर हो चाहे  बच्चा चोर के नाम पर हो वे अपना काम इस भीड़ बम के द्वारा करा ले जाते हैं यानी समाज में नफ़रत की चिंगारी फैला देते हैं। 

पिछले कुछ सालों से इस तरह की घटनाये बढ़ी हैं। अख़लाक़ हो, पहलु खान हों रअकबर खान हो भीड़ का बखूबी इस्तेमाल किया गया। इसे इस्तेमाल करना इस लिए कहा गया क्योंकि यह स्वाभाविक मॉब  लिंचिंग नहीं है यहाँ भीड़ जानती है किसे मारना है और किसे नहीं। 

मॉब लिंचिंग क्या है What is Mob Lynching


मॉब लिंचिंग यानि भीड़ के द्वारा की गयी हत्या वास्तव में समाज  के मुँह पर एक धब्बे या कालिख के सामान है जिसे किसी भी शिक्षित और सभ्य समाज के द्वारा एक्सेप्ट नहीं किया जा सकता। यह एक तरह से अराजकता वाली स्थिति है जहाँ ताकत ही न्याय का पर्यावाची होता  है। मॉब लिंचिंग वास्तव में भीड़ के द्वारा की गयी हत्या को कहते हैं जिसमे न तो आरोपित को अपना पक्ष रखने की आज़ादी होती है न तो मुकदमे की प्रक्रिया होती है और न न्याय की प्रतीक्षा। क्षण भर में फैसला हो जाता है और आरोपित की हत्या कर दी जाती है। 

मॉब लिंचिंग का इतिहास 


दुनिया में मॉब  लिंचिंग की प्रथा पुरानी  है।वास्तव में मॉब लिंचिंग शब्द अमेरिका के वर्जिनिया प्रान्त के जस्टिस चार्ल्स लिंच(1736-96) से लिया गया है जो अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने कठोर दंड के लिए जाने जाते थे। वे अतिरिक्त कानूनी मुकदमो की अध्यक्षता करते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अमेरिका में इस तरह की घटनाएं बहुतायत में होती थी। उनदिनों इसके शिकार अश्वेत लोग होते थे। 1882 से 1968 के बीच वहां लगभग 4742 लिंचिंग के केस आये थे। नाइजेरिआ में भी मॉब लिंचिंग एक गंभीर समस्या बन कर उभरी है। भारत में मॉब लिंचिंग की आखरी घटना 1950 में दर्ज की गयी थी। पर इधर कुछ वर्षों से हमारे देश ने इस तरह की कई घटनाओं को झेला है। 2006 में महाराष्ट्र में भैयालाल भोतमांगे समेत चार लोगों की लिंचिंग की गयी। 2017 में बल्लभगढ़ में सीट विवाद में जुनैद, 2016 में झारखण्ड के चतरा जिले में इम्तेयाज़ खान, दिल्ली में रिक्शा चालक रविंद्र कुमार की पीट पीट कर हत्या की गयी वहीँ दिमापुर में 2015 में फरीद खान जो की बलात्कार का आरोपी था उसे जेल से खींच कर उसकी हत्या की गयी, 2015 में दादरी में अख़लाक़ की हत्या 2017 में पुलिस उपाधीक्षक अयूब पंडित की हत्या, पहलु खान की हत्या रअक्बर खान की हत्या,  सिलसिला बहुत लम्बा है।   
       भीड़ द्वारा इस तरह से हत्या करने के पीछे अन्य कारणों के अलावा हमारा जातीय उन्माद, धार्मिक अभिमान तथा कट्टरता,जमीन के झगड़े,बलात्कार, अन्य जाति धर्म में शादी तथा दूसरों के प्रति हेय दृष्टि या नफरत भी है। ये सारी चीज़ें हमें असहिष्णुता की ओर ले जाती है और हम तय करने लगते हैं कौन क्या खायेगा क्या पहनेगा क्या बोलेगा और जो इस फ्रेम में फिट नहीं होते वे हमारी नज़रों में वे देशद्रोही या अपराधी हो जाते हैं। इस असहिष्णुता की वजह से पूरी कौम के प्रति वही माइंड सेट बन जाता है और इसका परिणाम जो भी होता है बुरा ही होता है। कई बार विरोध करने वाली चीज़े बहुत ही मामूली होती है पर उसका आधार बनाकर उन लोगों को टारगेट किया जाता है।  इस तरह की मुहीम में सोशल मीडिया का बहुत ही योगदान रहा है फेसबुक और व्हाट्सअप इस तरह का माइंडसेट तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पिछली कई घटनाओ में तो व्हाट्सप्प की वजह से ही लोगों ने मॉब लिंचिंग की। इसमें कई लोग बच्चा चोर समझ कर मारे गए। 
मॉब लिंचिंग तो इस पुरे भीड़ बम का एक हिस्सा मात्र है परन्तु इस पूरी भीड़ का दुरुपयोग भविष्य में कुछ लोग भारत में दंगा भड़काने और गृहयुद्ध करवाने में भी कर सकते हैं। जरुरत आज इस बात की है कि इस विषय पर समाजशास्त्रियों,मनोवैज्ञानिकों, कानूनविदों,साइबर एक्सपर्टों और धर्म के जानकारों को बैठ  कर गहन मंथन करने की और इस भीड़ बम को डिफ्यूज करने की। यह तभी संभव होगा जब हम एक दूसरे को समझेंगे,जानेगे, भरोसा करेंगे तथा अपनी तर्कशक्ति का प्रयोग करेंगे।  



July 18, 2018

Troll Kya Hai In Hindi



ट्रोल को समझने के पहले हमें हाल ही में घटी कुछ घटनाओं पर नज़र डालना होगा। अभी कुछ समय पहले की बात है देश में तमाम बलात्कार की बढ़ती घटनाओं पर कांग्रेस पार्टी की प्रियंका चतुर्वेदी ने एक ट्वीट किया। बात नार्मल से बयान की थी पर कुछ ही घंटों में इस एक ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया में बवाल हो गया। उनके इस बयान की प्रतिक्रिया में बहुत से भद्दे भद्दे, अश्लील कमेंट आने लगे। एक ने तो उनकी बेटी से बलात्कार करने की धमकी तक दे डाली। दूसरी घटना सुषमा स्वराज के साथ हुई एक पासपोर्ट के मामले में लोगों ने उनके ट्वीटर अकाउंट पर भद्दे कमैंट्स और गालियों की बौछार कर दी। किसी के विचार से असहमत होना न होना स्वाभाविक है। विचारों का विरोध भी स्वाभाविक है किन्तु विरोध का यह स्वरुप किसी भी मायने में किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकते। यह एक तरह की हिंसा है या यूँ कहे शाब्दिक हिंसा है वैचारिक बलात्कार है और मानसिक दिवालियापन है। एक तरह से यह चरित्र हनन या करैक्टर एसेसिनेशन है।

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What is Troll      ट्रोल किसे कहते हैं

सोशल मीडिया में इस तरह कमैंट्स करने की प्रक्रिया ट्रोल कहलाती है और ऐसा करने वाले ट्रोलर कहलाते हैं।
वास्तव में ट्रोल का सम्बन्ध ऐसे लोगों से होता है जो किसी भी मुद्दे या बहस में कूद कर आक्रामक, अश्लील और आपत्तिजनक बातों से उस विषय को भटका देते हैं। ये किसी के भी कमेंट या किसी व्यवहार को लेकर सोशल मीडिया पर एक मुहीम छेड़ देते हैं जिसमे धीरे धीरे बहुत से लोग शामिल हो जाते हैं और तो और उसके पक्ष में बोलने वाले को भी घसीट लेते हैं। बहुत बार यह मुहीम बहुत ही घटिया स्तर पर चली जाती है जिसमे गाली गलौज, अश्लील फोटोशॉप किये हुए फोटो, धमकी आदि का रूप ले लेती है। यह हरकत कमेंट करने वाले को बहुत ही मानसिक पीड़ा देती है।

कहाँ से आया है यह ट्रोल

ट्रोल शब्द का इतिहास खंगालने पर हम पाते हैं कि यह शब्द स्कैंडेनेविया की लोक कथाओं में खूब इस्तेमाल किया जाता था। उन लोक कथाओं में एक ऐसे जीव की चर्चा होती है जिसकी शक्ल बहुत ही भयानक और बदसूरत थी। यह जीव राहगीरों को डराते और धमकाते थे जिससे वे अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते। इसी जीव को वे ट्रोल कहते थे। अब इसी तरह का काम फेसबुक,ट्विटर आदि सोशल मीडिया के माध्यम से वे लोग करते हैं जो मुद्दों को भटका कर कहने वाले को अपने विषय से दूर ले जाते हैं।
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ट्रोल कौन करते हैं 

ट्रोलिंग करने वाले एक हो सकते हैं समूह में हो सकते हैं या अलग अलग क्षेत्रों से भी हो सकते हैं। सभी ट्रोलिंग में वही लोग हो सकते हैं या भिन्न भिन्न लोग हो सकते हैं। हो सकता है जो आज एक मुद्दे या एक व्यक्ति को ट्रोल कर रहा हो वो कल किसी अन्य मुद्दे या अन्य व्यक्ति को ट्रोल न करे। यह भी हो सकता है वह या सभी लोग कई मामलों में ट्रोल कर रहे हों।

ट्रोल क्यों होता है

आज के दौर में ट्रोल एक गंभीर समस्या बन के उभर रही है। अब स्वाभाविक ट्रोल न होके इरादतन ट्रोल की जा रही है और करायी जा रही है। ख़बरों के अनुसार राजनितिक दलों ने अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए, उनको अपमानित करने के लिए और जनता में उनकी छवि ख़राब करने के लिए अपनी अपनी टीम बनाया हुआ है जिसे साइबर सेल का नाम दिया गया है। इन टीमों का काम ही है रोज़ अपने विरोधियों को ट्रोल करना। ये सोशल मीडिया के सभी माध्यमों से अपना एजेंडा चलाते हैं और उनके लाखों लोग इसे सच मानकर उसे शेयर और फॉरवर्ड करते रहते हैं।

ट्रोल के पीछे कारण 

आखिर लोग ट्रोल करते क्यों हैं ? क्यों लोग अपना काम धाम छोड़ कर किसी को ट्रोल करते हैं ? मै इंटेंशनल ट्रोल की बात नहीं कर रहा हूँ। समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार ट्रोल एक वैचारिक असहमति है जिसके फलस्वरूप उत्पन्न एक प्रतिहिंसा है इसके माध्यम से वो अपना गुस्सा जाहिर करता है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो किसी और बात का बदला ट्रोल करके लेते हैं। पार्टी पसंद नहीं है उसके काम पसंद नहीं है तो उस पार्टी के किसी भी व्यक्ति के किसी भी वक्तव्य चाहे वह कितना भी सही कितना भी प्रासंगिक क्यों न हो, ट्रोल करेंगे। कई लोग जो आइडेंटी क्राइसिस से जूझ रहें हैं और जिसकी वजह से कुंठाग्रस्त हैं उनमे ये प्रवृति पाई जाती है। वे ऐसा करते हैं जिससे उन्हें पहचान मिल सके। कई लोग समाज में अपनी भावनाएं नहीं व्यक्त कर पाते हैं निराश और कुंठाग्रस्त रहते हैं वैसे लोग भी ट्रोल के माध्यम से अपनी भड़ास निकालते हैं।
कई बार कुछ लोग यूँ ही ट्रोल करने लगते हैं उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ फन या टांग खिचाई होता है। लेकिन विशेषज्ञों की माने तो ट्रोल तभी ट्रोल माना जायेगा जब उसके पीछे उद्देश्य या सोची समझी रणनीति हो अर्थात मुद्दे से भटकाना और आपको परेशां करना।

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एक्सपर्ट्स के अनुसार ट्रोल के चार  प्रकार होते हैं

एक्सीडेंटल ट्रोल : इस तरह का ट्रोल किसी व्यक्ति के द्वारा कभी भी किया जा सकता है। इसमें कोई सोची समझी नीति नहीं होती है। इस तरह के ट्रोल में व्यक्ति किसी स्टेटमेंट से असहमति की दशा में काफी आक्रामक हो जाता है और भद्दे भद्दे कमैंट्स करने लगता है। इससे ट्रोलड व्यक्ति काफी आहत और परेशां हो जाता है और मुद्दे से हट जाता है। चुकि इस तरह के ट्रोल में कोई सोची समझी रणनीति नहीं होती अतः बहुत से जानकार इसे ट्रोल नहीं मानते।

कॉर्पोरेट ट्रोल : इस तरह की ट्रॉल्लिंग बड़ी बड़ी कम्पनियों के द्वारा प्रायोजित की जाती है। इसके द्वारा वे कंपनी की झूठी तरक्की दिखाते हैं तथा पब्लिक में कंपनी के प्रोडक्ट को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है।कंपनियां अपने कस्टमर्स बढ़ाने के लिए ट्रोल के माध्यम से अपने प्रोडक्ट को जनता के सामने लाती हैं। वास्तव में इस तरह से वे अपना विज्ञापन करती हैं।

पोलिटिकल ट्रोल : इस तरह के ट्रोल राजनितिक पार्टियों के द्वारा किये जाते हैं। पार्टियां अपने अपने साइबर सेल  के द्वारा अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए कई तरह के ट्रोल करवाती है। साथ ही ट्रोल के द्वारा पार्टियां जनता के बीच कोई निगेटिव इमेज न बने इसका प्रयास करती है।

आर्गनाइज्ड ट्रोल : हॉवर्ड विश्वविद्यालय के राजनीती शास्त्र के प्रोफेसर गैरी किंग के अनुसार इस समय पूरी दुनिया में आर्गनाइज्ड ट्रोल का सबसे ज्यादा चलन है। कंपनियां या राजनितिक पार्टियां,सरकारें सोची समझी रणनीति के तहत लोगों की एक फौज खड़ी करती है। इनका काम ही ट्रोल करना होता है। इसके माध्यम से सोशल मीडिया में इनके पक्ष में हवा बनायीं जाती है। विरोधियों की छवि ख़राब की जाती है। गैरी किंग के अनुसार आर्गनाइज्ड ट्रोल सबसे खतरनाक किस्म का ट्रोल होता है। प्रोफेसर किंग की रिपोर्ट की माने तो  पिछले साल चीन ने 44 करोड़ पोस्ट सरकारी नीतियों के पक्ष में करवाए थे। यह एक आर्गनाइज्ड ट्रोल था जिससे कि माहौल सरकार के पक्ष में बना रहे। कथित रूप से बीजेपी के साइबर सेल में काम कर चुकी साध्वी खोसला ने अपनी किताब में यह उजागर किया था कि पार्टी ने कुछ ख़ास लोगों की एक लिस्ट तैयार करके रखी है और इस साइबर सेल के कर्मचारी उस लिस्ट में शामिल लोगों को लगातार ट्रोल करते रहते हैं। साध्वी के अनुसार आमिर खान के असहिष्णुता वाले बयान पर उन लोगों से ट्रोल करने को कहा गया था ताकि स्नैपडील अपना ब्रांड अम्बेस्डर चेंज कर दे।
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ट्रोल चाहे जैसे भी हो आज यह एक लाइलाज मर्ज़ हो गया है। जिस तरह से आज ट्रोल का चलन है कोई भी खबर विश्वसनीय नहीं रह गयी है। फेक न्यूज़ के ज़माने में कब किसका चरित्र हनन हो जाये कोई नहीं जानता। चाहे वह गुरमेहर हो या भी दंगल फेम जायरा वसीम हो, कभी अनुष्का की पारी आती है तो कभी प्रियंका चोपड़ा की। सब ट्रोल की कभी न कभी शिकार हो चुकी हैं। इन्हें भद्दी भद्दी गालियां दी गयी जान से मारने की धमकी दी गयी और तो और रेप की धमकी भी दी गयीं। नरेंद्र मोदी को उनके 15 लाख वाले बयान हों या पकौड़े वाले बयान, काफी ट्रोल किये गए। राहुल गाँधी तो हमेशा ट्रोल के निशाने पर रहते है हैं।
ट्रोलिंग का यह घिनौना और भयानक ट्रेंड दिन प्रति दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। इसे एक तरह से साइबर हमला भी कह सकते हैं। इसी वजह से सोशल मीडिया अब महिलाओं के लिए काफी असुरक्षित और धमकी भरा प्लेटफार्म बनता जा रहा है। यही सब देखते हुए सरकार इसके लिए एक एप्प लांच करने की सोच रही है "I am Trolled" नाम से इस एप्प से ट्रोल की शिकार महिलाएं मदद ले सकेंगी।

July 15, 2018

Social Media Aur Internet Addiction Disorder



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क्या आप भी दो नीली टिक होने का इंतज़ार करते हैं और नहीं होने पर बेचैन हो जाते हैं बार बार चेक करते हैं  क्या आप भी लाइक्स और व्यूज गिनते हैं क्या आप भी बार बार मैसेज इन्फो चेक करते हैं ? यदि हाँ तो आप नेट एडिक्ट यानि आपको भी नेट के नशे ने अपने चपेट में ले लिया है और जिस प्रकार एक नशेड़ी नशे में अपनी सूध बुध खो बैठता है ठीक उसी प्रकार नेट एडिक्ट भी मानसिक रूप से चेतनाशून्य हो जाता है। उसका किसी काम में मन नहीं लगता है वह अपने काम के प्रति लापरवाह और चिड़चिड़ा हो जाता है कभी कभी वह निराश और हिंसक भी हो जाता है।
आज हम इंटरनेट युग में जी रहे हैं या यूँ कहें इंटरनेट हमारी जिंदगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन चूका है।  विद्युत् शक्ति के बाद यही एक चीज़ है जिस पर लगभग सारी चीज़ें निर्भर हो गयी हैं। सारे कामों में इसका दखल है। इंटरनेट ने हमारी जिंदगी को काफी आसान और आरामदायक बना दिया है। मोबाइल क्रांति के बाद
इंटरनेट क्रांति के  साथ ही कई सामजिक और राजनितिक बदलाव हुए। इंटरनेट भारतीय जनमानस को अपना गुलाम बना चूका है। लोगों की सोच, उनके विचार , सामाजिक व्यवहार, रहन सहन सब पर इंटरनेट का प्रभाव देखा जा सकता है। इंटरनेट ने कई असंभव या देरी से होने वाले कार्यों को संभव या द्रुत बना दिया है वहीँ यह कई बुराइयों का जनक भी है। रेलवे इन्क्वारी के सामने या रिजर्वेशन काउंटर के सामने अब भीड़ नदारद हो रही है। लोग घर से ही ट्रैन का स्टेटस देख कर निकल रहे हैं साथ ही अपना टिकट खुद ही बुक कर रहे हैं। अब आपको दुकान जा कर घंटों सामान पसंद करने की जरुरत नहीं बल्कि दुकान आपकी मोबाइल में ही शिफ्ट हो चूका है। कहीं से कुछ भी पसंद करके आप मंगा सकते हैं। सारी दुनिया एक प्लेटफार्म पर आ चुकी है इसमें आप अपने बिछड़े हुए दोस्तों से मिल सकते हैं, दूर रहने वाले रिश्तेदारों के हाल चाल पा सकते हैं और आपके जीवन में क्या क्या परिवर्तन हुए मसलन शादी, बच्चे अन्य कार्यक्रम टूर सब शेयर कर सकते हैं। किसी को किसी का हाल चाल पूछने की जरुरत ही नहीं। सोशल साईट आन किया और आप सब जानकारियों से अवगत हो गए। 
कुल मिलकर हम कह सकते हैं इंटरनेट ने हमें अपने चंगुल में ले लिया है या हम खुद उसके चंगुल में आ गए हैं।
कहा जाता है कि हर चीज़ की अति नुकसानदायक होती है। यही बात इंटरनेट पे भी लागू होती है। जब तक हम अपने अनुसार उसका प्रयोग करते हैं तब तक तो हम फायदे में रहते हैं परन्तु जहाँ हम खुद प्रयोग होने लगते हैं उसके दुष्प्रभाव दीखने लगते हैं। खुद प्रयोग होने का मतलब है कि हम मजबूर हो जाएँ उसे ऑन करने के लिए चाहे उसकी जरुरत हो न हो। सोशल मिडिया पर एक्टिव रहने का लोगों को ऐसा चस्का लगा है कि लोग अपने जरुरी कामों को भी छोड़ कर उसे चेक करते रहते हैं। रात को सोने के पहले तक, सुबह में उठने पर सबसे पहले लोग अपना मोबाइल चेक करते हैं। स्थिति यहाँ तक आ चुकी है कि यदि दो घंटे मोबाइल डिस्चार्ज हो जाये तो वे बेचैन हो जाते हैं।

क्या है इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर                                        What is Internet Addiction Disorder in Hindi 
Smartphone Hand Photomontage Faces Photo A

इंटरनेट के प्रति लोगों की यह चिपकने वाली प्रवृति पहले तो आदत फिर नशा और फिर बीमार बना रही है। लोग हर पांच दस मिनट पर अपना स्टेटस चेक कर रहे हैं, नोटिफिकेशन देख रहे हैं, व्यूज और लाइक्स गिन रहे हैं। कई लोग तो घंटों नेट सर्फिंग में डूबे रह रहे हैं। ऐसे व्यक्ति चाह कर भी नेट से दूर नहीं रह पाते हैं। शुरू शुरू में तो पता नहीं चलता पर धीरे धीरे लोग इसके एडिक्ट हो जाते हैं और जैसे ड्रग एडिक्ट ड्रग के लिए बेचैन और छटपटाते हैं ठीक उसी प्रकार नेट एडिक्ट की भी हालत हो जाती है। मेडिकल साइंस में इसे एक मानसिक बीमारी कहा जाता है और इसका नाम इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर दिया गया है। इसे शार्ट में IAD भी कहा जाता है। यह बीमारी गंभीर न दीखते हुए भी वास्तव में बहुत नुकसानदायक है। कई मनोवैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि यह लत ड्रग्स या शराब जितना ही खतरनाक असर डालती है। बच्चों में तो इसका खासा असर देखा जा  सकता है।

इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति में नीचे दिए गए लक्षण पाए जा सकते हैं 

  • निराशा और चिड़चिड़ापन
  • ड्राई आँखें और धंसी आँखें
  • कमजोर दृष्टि और आँखों में जलन
  • सिरदर्द और कमरदर्द रहना
  • हाथ और कलाइयों में दर्द तथा अकड़पन होना
  • वजन में तेजी से बढ़ोतरी या घटना
  • अनिद्रा
  • थकान और कमजोरी
  • मानसिक कमजोरी तथा भावूक होना
  • बच्चों का जिद्दी होना
  • बेचैनी और उतावलापन
  • अंगूठे तथा अंगुलियों में क्रैम्प आना
  • एकाग्रता का आभाव
इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर के रोगी प्रायः सोशल साइट्स जैसे फेसबुक,व्हाट्सअप, ट्विटर, यूट्यूब  और अश्लील साइट्स का जरुरत से ज्यादा प्रयोग करते है। इसके अलावा ऑनलाइन गेम्स का भी इसमें बहुत बड़ा हाथ है। इन्ही साइटों पर लोग ज्यादा समय देते हैं। इस तरह के रोगी प्रति दिन पांच से सात घंटे इन साइट्स पर देने लगते हैं। ये साइट्स अपने यूजर्स को लम्बे समय तक बाँधे रखती हैं। हालाँकि यह आवश्यक नहीं है साईट कोई भी हो जरुरत से ज्यादा प्रयोग इस तरह का नुकसान पंहुचा सकती है। 

इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर से होने वाले नुकसान 
  1. शारीरिक : इस बीमारी से ग्रसित लोगों में कई तरह के शरीरीरिक दिक्कतें आती हैं। आँखों के सूखने के अलावा उसमे जलन, दृष्टिदोष आदि भी आ जाती है। इसके अलावा अँगुलियों तथा कलाइयों में अकड़न,सुन्नपन और दर्द हो सकता है। अनिद्रा, भूख की कमी , मोटापन या दुबलापन आदि आ सकता है।  

  1. मानसिक : ऐसे लोग भावनात्मक रूप से काफी कमजोर हो जाते हैं। ऐसे लोगों में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन, उदासी  या अवसादग्रस्त होने की स्थिति भी आती है। नेट से दूर होने पर ऐसे लोग बेचैन तथा चिड़चिड़े हो जाते हैं। पर्याप्त लाइक्स,व्यूज या कमैंट्स नहीं मिलने पर वे निराश और अवसादग्रस्त हो जाते हैं। वे बार बार रिफ्रेश करके लाइक्स और व्यूज आदि में हुई बढ़ोतरी को देखते रहते हैं। जब उम्मीद के अनुरूप इनकी संख्या नहीं बढ़ती है तो वे निराश और बेचैन हो जाते हैं। ऐसे में वे बार बार अपने मुख्य काम को छोड़ कर इन्हे चेक करते रहते हैं  जिससे कि इनका ध्यान बटता है।  
  2. सामाजिक :ऐसे लोग अपना सारा समय नेट पर देने की वजह से समाज से कटते चले जाते हैं। ये प्रायः एकाकी और अंतर्मुखी हो जाते हैं। ऐसे लोग डिप्रेसन के शिकार हो जाते हैं। धीरे धीरे उनका आत्मविश्वास लेवल गिरने लगता है। 
  3. आर्थिक : इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर व्यक्ति के आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। बार बार नेट चेक करने की वजह से काम में लापरवाही होती है और कोई काम समय पर पूरा नहीं होता और न ही परफेक्ट होता है। इस वजह से काम छूटने का भी भय रहता है। साथ ही यह प्रोडक्टिविटी को भी प्रभावित करता है और उत्पादन कम होने लगता है जो कि अंततः हमारे आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। 
इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर से बचने के उपाय 

इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर से बचना नामुमकिन तो नहीं पर आसान भी नहीं है। इसके लिए दृढ इच्क्षा शक्ति का होना आवशयक है। इसका पता चलते ही इससे बचने के उपाय शुरू कर देने चाहिए। इससे कुछ उपाय के द्वारा बचा जा सकता है 


  • सबसे पहले आपको स्वयं इस बात को मानना होगा कि आप इंटरनेट एडिक्ट हो चुके हैं। ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्योंकि अकसर यह देखा जाता है कि ऐसे रोगी अपनी इस बीमारी से अनभिज्ञ रहते हैं। यहाँ तक कि कोई बताता है तब भी उन्हें विश्वास नहीं होता। अतः सिम्टम्स दीखते ही सतर्क हो जाना चाहिए। 
  • इससे बचने के लिए आपके अंदर दृढ इच्क्षा शक्ति होनी चाहिए क्योंकि इससे बचने के लिए किसी दवा की नहीं बल्कि आपकी दिनचर्या को संयमित रखने की जरुरत है। 
  • इससे बचाव के लिए आपको अपने सोशल साइट्स पर गतिविधि कम करना होगा बल्कि उनके लिए आपको फिक्स्ड टाइम बनाना होगा जैसे कि सोशल साइट्स दिन में कितनी बार चेक करनी है। सोशल साइट पर मित्रों की संख्या सिमित रखे। व्हाट्सप्प आज हमारे काम का हिस्सा बन चूका है यह हमारे काम में काफी मददगार साबित होता है अतः इसके लिए टाइम निर्धारित नहीं कर सकते पर इतना तो कर सकते हैं कि अपने व्यवसाय और जॉब से सम्बंधित मैसेज को ही चेक करें तथा अन्य सभी मैसेज को दिन में एक निश्चित समय बना लें और केवल उसी समय चेक करें  और जवाब दें। यह शुरू शुरू में तो काफी मुश्किल होगा पर धीरे धीरे इस पर काबू पाया जा सकता है। 
  • अकेले कम से कम रहें और वर्चुअल मित्रों के बजाय वास्तविक मित्रों के साथ समय गुजारें। मित्रों के अलावा परिवार के सदस्यों के साथ भी समय देना चाहिए। 
  • आज के दौर में इंटरनेट को परे रख कर कोई काम नहीं किया जा सकता है कई मायनों में यह हमारे रोज़गार का ही हिस्सा है अतः न चाहते हुए भी हमें घंटों नेट के सामने बैठना पड़ता है। ऐसी स्थिति में हमें बस प्रयास करना चाहिए कि हम केवल अपने काम के साइट्स को ही खोलें अन्य साइट्स जैसे सोशल मीडिया आदि से भरसक बचना चाहिए। इनके लिए समय निर्धारित कर देना चाहिए। 
  • बच्चों पर बहुत ध्यान रखना होगा। नेट से उनकी नजदीकी आपके नियंत्रण में होनी चाहिए। 
इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर का उपचार 

इंटरनेट एडिक्शन से हुए नुकसान के लिए हमें कुछ उपचार की भी आवश्यकता पड़ सकती है 
  • आँखों के ड्राई होने तथा रौशनी कम होने की स्थिति में अविलम्ब किसी नेत्र चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। 
  • कमर दर्द, गर्दन दर्द या अँगुलियों में अकड़न होने पर भी तुरत किसी अच्छे डॉक्टर से मिलना चाहिए नहीं तो स्थिति काफी विकट हो सकती है। 
  • मानसिक विकारों के लिए सम्बंधित योगा किया जा सकता है। 
  • नींद अच्छी और पर्याप्त लें। इससे शरीर और आँखों को काफी रहत मिलती है। 
  • अकेले न रहें। दोस्तों, सहकर्मियों और परिवार के सदस्यों के साथ रहें। 
  • पौष्टिक भोजन लें। शरीर को फिट रखने के लिए थोड़ा व्यायाम भी करें। 

July 06, 2018

Japani Encephalitis Ya Japani Bukhar Kya Hai, Bachne Ke Upay



जुलाई का महीना शुरू होते ही भारत में खासकर उत्तर भारत में कई बीमारीओं का प्रकोप चालू हो जाता है
इन बीमारियों में डेंगू,चिकेनगुनिया,जापानीज इंसेफ्लाइटिस आदि प्रमुख हैं। ये सारी बीमारियां काफी खतरनाक और जानलेवा हैं। अकेले जापानी इंसेफ्लाइटिस ने ही पुरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में महामारी का रूप ले लिया है। इन महीनों में गोरखपुर और आसपास के सारे अस्पताल इस रोग के मरीजों से भरे रहते हैं। हर साल कई लोगों की खासकर बच्चों की मृत्यु भी हो जाती है। उत्तर प्रदेश के अलावे बिहार,झारखण्ड,उड़ीसा,पश्चिम बंगाल,असम,मेघालय,मणिपुर,कर्नाटक आँध्रप्रदेश,तमिलनाडु आदि राज्य भी इस बीमारी से प्रभावित हैं।
जापानी इंसेफ्लाइटिस का सबसे पहला केस 
दुनिया में जापानी एन्सेफलाइटिस का सबसे पहला केस जापान में सन 1871 में पाया गया। इसी कारण इसे जापानी एन्सेफलाइटिस या जापानी बुखार कहा जाता है। यह मुख्य रूप से चावल के खेतों में पनपने वाले मच्छरों  के जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस जो एक फ्लेविवायरस होता है से संक्रमित होने से होता है। ये मच्छर जब पालतू सूअर और पक्षियों को काटते हैं तो ये वायरस उनके शरीर के रक्त में चले जाते हैं जहाँ वे परिवर्धित होते हैं। अब इन पक्षियों या सूअरों को फिर से मच्छर काटते हैं तो ये परिवर्धित वायरस उनके लार में चले जाते हैं। अब ये मच्छर किसी मनुष्य को काटते हैं तो उस व्यक्ति को इसका संक्रमण हो जाता है।
भारत में सर्वाधिक प्रभावित राज्य तथा जिले 
इस रोग से भारत समेत विश्व के कई देश प्रभावित हैं। भारत में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश है जहाँ इसके 39 जिलों में इस रोग की उपस्थिति दर्ज की जा चुकी है। सर्वाधिक प्रभावित जिलों में गोरखपुर,कुशी नगर,सिद्धार्थ नगर,महराजगंज,देवरिआ,संत कबीर नगर आते हैं। अकेले गोरखपुर में इन दिनों जापानी बुखार के मरीजों की बाढ़ आयी रहती है। भारत में सबसे पहला केस 1955 में तमिलनाडु में पाया गया था जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसका पहला मामला 1978 में प्रकाश में आया जब 528 मरीजों की मृत्यु इसी बीमारी से हो गयी थी। सरकारी आकड़ों के अनुसार हर साल इस इलाके में पांच से छह सौ बच्चों की मृत्यु इस रोग से होती है। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1978 से अब तक केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस बीमारी से 50,000 से भी ज्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 
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जापानी इंसेफ्लाइटिस क्या है 
जापानी इंसेफ्लाइटिस एक प्रकार वायरस है जिसकी वजह से दिमाग में सूजन आ जाती है और मरीज को तेज  साथ झटके आने लगते हैं। इसे दिमागी बुखार या  मस्तिष्क ज्वर भी कहते है। यह एक फ्लाविवाइरस है जो उसी प्रजाति का होता है जिस प्रजाति के वायरस डेंगू, पीला बुखार और पश्चिमी नील वायरस के होते हैं। 
वर्ष के किन महीनो में इसका खतरा होता है 
भारत में दिमागी बुखार का प्रकोप जुलाई से नवंबर तक होता है। बरसात की वजह से जगह जगह पानी भरा होता है  से मच्छरों का प्रजनन इन दिनों  ज्यादा होता है। 

जापानी एन्सेफलाइटिस के लक्षण 

दिमागी बुखार में शरीर में ज्वर से लेकर सर में दर्द, गर्दन में अकड़न, झटके आदि आ सकते हैं। यह सबसे ज्यादा बच्चों पर असर डालता है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं :
  • तेज़ बुखार होना 
  • मिचली या उलटी होना 
  • तेज़ सरदर्द होना 
  • झटके आना 
  • तेज प्रकाश से घबराना (फोटोफोबिआ)
  • शरीर के जोड़ों में दर्द होना 
  • आँखों की गति अनियंत्रित होना, कभी एक ओर तो  कभी दूसरी ओर जाना 
  • गर्दन अकड़ना 
  • बोलने तथा अन्य शारीरिक गति में असमर्थता 
  • आंशिक या पूर्ण अंधता 
  • भ्रम की स्थिति होना 
  • शरीर के कुछ हिस्सों में संवेदना नहीं होना 
  • होश खो बैठना 
कई बार इस बीमारी में लकवे की भी संभावना होती है। कुछ केस में रोगी कोमा में चला जाता है। इस बीमारी के दूरगामी प्रभाव देखे जाते हैं। इसमें बच्चों में मस्तिष्क सम्बन्धी समस्याएं पैदा हो जाती है। उनके मस्तिष्क का विकास धीमी गति से होता है या रूक जाता है। इस बीमारी से ठीक हुए बच्चों के बौना होने की संभावना होती है। 

जापानी एन्सेफलाइटिस किस एज ग्रुप में ज्यादा होता है 

जापानी एन्सेफलाइटिस मुख्य रूप से चौदह वर्ष तक के बच्चों और 65 साल से ऊपर के लोगों को होता है। छोटे बच्चों में तो यह बहुतायत में पाया जाता है। 

जापानी एन्सेफलाइटिस के कारक/ वाहक 


जापानी एन्सेफलाइटिस के वायरस सूअर और जंगली पक्षियों  के शरीर में पोषित होते हैं। मच्छर इन सूअरों से मनुष्य में इस बीमारी का संचरण करते हैं। इसके विषाणु मनुष्य के रक्त में आते ही सबसे पहले उसके मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। यह छूने या साथ में रहने से नहीं फैलती है। इसके वायरस कुछ अन्य विषाणुओं की वजह से भी संचारित होते हैं जैसे रेबीज़ वायरस,हर्पीज सिंप्लेक्स,पोलियो वायरस,खसरे का वायरस,चेचक,सेंट लुइस वायरस, नील बुखार वायरस आदि।
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जापानी एन्सेफलाइटिस की जांच 

इस रोग के उपचार के लिए सबसे पहले इसकी जांच की जाती है। इसके लिए सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड का नमूना जांच के लिए भेजा जाता है। संक्रमित व्यक्ति के सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड में इस रोग के एंटीबॉडीज पाए जाते हैं। सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड को रीढ़ की हड्डी में लम्बर पंक्चर करके निकला जाता है। 


जापानी एन्सेफलाइटिस का उपचार


हालाँकि जापानी एन्सेफलाइटिस का कोई इलाज नहीं है तो भी लक्षणों के आधार पर मेडिकल ट्रीटमेंट दिया जाता है। लक्षण दिखते ही मरीज को तुरंत किसी हॉस्पिटल में भर्ती कराया जाना चाहिए। इसमें मरीज को अस्पताल में 10 से 15 दिन तक रहना पड़ सकता है। इस दौरान मरीज को लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा जाता  हैं जिसमे आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन देना, लक्षणों से उबरने के लिए दवाएं देना, और ज्यादा नुकसान न हो इसका ख्याल रखें आदि शामिल हैं। 

जापानी एन्सेफलाइटिस से बचने का सबसे बेहतर तरीका है टीका लेना। बच्चों समेत सभी को इसका टीका लेना चाहिए। टीका लेने से शरीर में एंटीजेन उत्पन्न हो जाते हैं और इसका असर अप्रभावी हो जाता है। 

जापानी एन्सेफलाइटिस से बचाव 



  • जापानी एन्सेफलाइटिस से बचाव ही इसका सबसे बढियाँ इलाज है। इससे बचने के लिए हर वह काम करने चाहिए जिससे कि  मच्छर न  काटे।

  • हमेशा फुल स्लीव के कपडे पहने।

  • अपने रहने के स्थान पर साफ़ सफाई का विशेष ध्यान दें।


  • गंदे पानी के प्रयोग से बचे साथ ही खाने में भी ख़ास सफाई का ध्यान रक्खें। 

  • मच्छरदानी लगाकर ही सोएं
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  • खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाएं

  • मच्छर भगाने वाले coil  और लिक्विड का प्रयोग करें 

  • दिन में भी पूरी सावधानी बरतें 

  • आसपास कहीं भी जैसे कूलर,खाली टायर , बर्तन ,पुराने गमले ,गड्ढे आदि में पानी जमा न होने दें।

  • समय समय पर कीटनाशक का छिड़काव घर और गली मोहल्ले में करवाना चाहिए



  • यदि घर के आसपास पानी जमा भी होता है तो उसमे केरोसिन तेल डालें जिससे कि मच्छरों के अंडे नष्ट हो जायें।
  • आस पास के गड्ढे, पोखरों में कीटनाशक का छिड़काव होना चाहिए। 


  • सूअर पालन रिहाइशी क्षेत्रों से दूर करना चाहिए। 


  • सभी को खासकर बच्चों को जे ई के टिके लगवाने चाहिए। 
इस बीमारी की भयावहता और बाद के प्रभाव को देखते हुए इसका बचाव जहाँ तक हो सके करना चाहिए। सरकार को बचाव के उपाय तथा टीके पर विशेष जोर देना चाहिए। इसके साथ ही हम सब का कर्तव्य है कि अपने स्तर से वे सारे उपाय करने चाहिए जिससे कि यह बीमारी न फैले। 

July 02, 2018

The Untold Story Of Sunny Leone : Kuchh Rochak Jankariyan

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आज हम जिसकी चर्चा करने जा रहे हैं  भारतीय फिल्मों की वह अभिनेत्री है जिसे लोग उसके अभिनय या सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि किसी और वजह से जानते हैं। जी हाँ सन्नी लिओन जो अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने पास्ट की वजह से सर्च की जाती हैं। इंटरनेट पर, समाचारपत्रों में, पत्रिकाओं में सन्नी की जितनी चर्चाएं हैं ऐसे में उन्हें कौन नहीं जानता। सन्नी लिओन नाम लेते ही दिमाग में बहुत कुछ चलने लगता है और यदि आप लिओन के बारे में वही स्टीरिओ टाइप जानकारी पाना चाहते हैं तो यह पोस्ट आपके लिए नहीं है। आज उसी सनी लिओन के जीवन के उन पहलुओं को जानेंगे जिससे दुनिया बहुत कम वाकिफ है। 
  • सनी लिओन का जन्म सार्निया ओंटारियो में 13 मई 1981 में एक सिक्ख परिवार में हुआ था। 
  • उनका वास्तविक नाम केरेनजीत कौर वोहरा है। 
  • उनके पिता का जन्म तिब्बत में हुआ था पर वे दिल्ली में पले बढे जबकि उनकी माँ हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव से थीं। 
  • सिक्ख परिवार के होने के बावजूद उनकी पढाई क्रिस्टी स्कूल में हुई क्योंकि अन्य स्कूलों में उनका जाना सेफ नहीं था। 
  • बचपन में वे काफी चुस्त दुरुस्त थीं और लड़कों के साथ हॉकी खेला करती थीं। हॉकी के साथ उन्हें इसके स्केटिंग भी पसंद था।
  • बारह वर्ष की अवस्था में उनका परिवार मिशिगन के फोर्ट ग्रेटियट चला गया और फिर अगले साल लेक फारेस्ट कैलिफोर्निआ शिफ्ट हुआ। 
  • पोन फिल्मों में आने के पहले वो जिफ्फी लूब नामक जर्मन बेकरी में काम करती थीं। 
  • इसके बाद वे एक कर और निवृति मामलों से जुड़ी कंपनी में भी काम की। 
  • उन्होंने ऑरेंज काउंटी में नर्स की भी पढाई की है। इसी दौरान उनकी सहेली जो एक डांसर थी उन्हें जॉन स्टीवंस से मिलवाया। इसी सहेली ने उनकी मुलाकात जे एलेन से करवाई जो पेंटहाउस मैगज़ीन के चित्रकार थे। इस करियर के लिए उन्होंने अपना नाम सनी बताया जिसमे बॉब गिसोनी जो पेंटहाउस के पूर्व मालिक थे लिओन जोड़ दिया। 
  • कई लोग सोचते हैं सन्नी ने गरीबी और मजबूरी में आकर इस इंडस्ट्री में कदम बढ़ाया पर यह गलत है। इस इंडस्ट्री को ज्वाइन करने का निर्णय उनका अपना था और इसके पीछे कोई मजबूरी या जबरदस्ती नहीं थी। उन्हें इस इंडस्ट्री में आने का कोई पछतावा भी नहीं है। 
  • सनी ने एल एल सी नाम से अपनी एक कंपनी शुरू की। इसके द्वारा बनाये गए फिल्मों में 80 प्रतिशत से ज्यादा कस्टमर इंडिया से होते थे और इनकम का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा भारत से ही आता था। सनी ने 42 एडल्ट फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया है इनमे से 41 फिल्मों में उन्होंने खुद काम किया है। 
  • लिओन के पास अमेरिका और कनाडा की दोहरी नागरिकता है। 
  • उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं। हस्लर मैगज़ीन के 2001 संस्करण में उन्हें हस्लर हनी का सम्मान दिया गया। 
  • 2008 में वेब बेब ऑफ़ द  ईयर, 2010  वेब स्टारलेट ऑफ़ द  ईयर , 2012 में पोन इट ऑफ़ द ईयर का सम्मान उन्हें मिल चूका है। 
  •  हिंदी फिल्मों में सनी को लाने का पहला प्रयास निर्देशक मोहित सूरी ने किया था। उन्होंने अपनी फिल्म कलयुग के लिए संपर्क किया था किन्तु सनी ने इसके लिए 10 लाख डॉलर की मांग की थी जिस वजह से मामला ठन्डे बस्ते में चला गया। 
  • हिंदी फिल्मों में उन्होंने अपना डेब्यू जिस्म 2 से किया था। 
  • जिस्म 2 के अलावा जैकपॉट,रागिनी एम् एम् एस आदि फिल्मों में भी उन्होंने काम किया है। 
  • उन्होंने भारतीय टीवी शो बिग बॉस सीजन 5  में भी काम किया है। 
  • बिग बॉस के पहले उन्हें पहली बार भारतीय टेलीविज़न पर चैनल  एम् टीवी पर एम् टीवी अवार्ड में कवर किया गया था किन्तु तब उन्हें कोई जानता नहीं था। 
  • हालाँकि सनी ने हॉरर फिल्मों में काम किया है परन्तु अपने वास्तविक जीवन में भूत प्रेत से नहीं डरती। यह बात और है कि उन्हें छोटे छोटे कीड़े  मकोड़ों से खूब डर लगता है। 
  • सनी को पराठे बहुत पसंद हैं। इसके साथ ही उन्हें इटालियन फ़ूड खासकर पाश्ता बहुत पसंद है। 
  • सनी के अनुसार वे बाइसेक्सुअल हैं अर्थात उन्हें मर्दों के साथ साथ लड़कियों के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध बनाना पसंद है। 
  • सनी लिओन को बॉलीवुड में अभिनेता रणवीर सिंह  बहुत पसंद है। 
  • सनी कुछ समय तक कमेडियन रसेल पेटर्स के साथ डेट की। 
  • खबरों के अनुसार बॉलीवुड के दो निर्देशकों ने उन्हें कास्टिंग काउच, साथ में सोने का ऑफर दिया जिसे वे इंकार कर दी। 
  • लिओन का सम्बन्ध कुछ दिनों के लिए प्लेबॉय इंटरप्राइजेज के वाईस प्रेजिडेंट मैट एरिक्सन के साथ भी चला जो 2008 में टूट गया। 
  • सनी ने अपना पहला किस 11 वर्ष की अवस्था में किया और पहला यौन सम्बन्ध 16 साल में एक बास्केटबॉल प्लेयर के साथ बनाये। 
  • सनी और विवादों का साथ उनके भारत आने के साथ ही शुरू हो गया था। बिग बॉस के दौरान उनपर यह आरोप लगाते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय में कम्प्लेन किये गए कि कलर्स चैनल के द्वारा वे भारत में पोरोनोग्राफी को बढ़ावा दे रही हैं। 
  • बिग बॉस और हिंदी फिल्मों में काम को लेकर उनका बहुत विरोध हो चूका है। 
  • उनकी फिल्म जिस्म 2 के पोस्टर के लिए भी काफी बवाल हुआ। 
  • अपनी फिल्म रागिनी एम् एम् एस की सफलता के लिए वे मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर मन्नत मांगने जब गयी तो उन्हें पुजारिओं और कई संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा। 
  • 2015 में मुंबई में एक महिला के द्वारा उन पर एक FIR दर्ज यह आरोप लगाते हुए किया गया कि वे भारतीय संस्कृति को नुकसान पंहुचा रही हैं। इस बाबत ठाणे पुलिस साइबर सेल में 292,292A और 294 सेक्शन के तहत उनपर मुकदमा दर्ज किया गया।  
  • 2017 में कन्नड़ संगठन रक्षणा वैदिक युवा सेना ने बेंगलुरु में सनी नाइट का विरोध किया। उन्होंने धमकी दी कि यदि कार्यक्रम को रद्द नहीं किया गया तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे। कानून व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी। 
  • इसी तरह 2018 में चेन्नई में भी उनके खिलाफ एक मुक़दमा दर्ज किया गया जिसमे वही आरोप लगाए गए थे।
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  • 2014 में गूगल पर सबसे ज्यादा किसी सेलिब्रिटी को सर्च किया गया तो वो सनी लिओन थीं। 
  • एक्टिंग के अलावा वे अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के लिए फण्ड जुटाने के लिए वे रॉक एन रोल लॉस एंजेलिस हाफ मैराथॉन में भाग ले चुकी हैं। इसके अलावा वे PETA यानि पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ एनिमल्स के एक कार्यक्रम का भी हिस्सा रह चुकी हैं। 
  • सनी लिओन की शादी डेनियल वेबर से हुई है।
  • जुलाई 2017 में लिओन और उनके पति डेनियल वेबर ने लातूर के एक बच्चे को गोद लिया। इस बच्ची का नाम उन्होंने निशा कौर वेबर रखा। 4 मार्च 2018 को उनके यहाँ जुडवा लड़कों का जन्म हुआ जो सरोगसी द्वारा पैदा हुए।
  • अप्रैल 2016 में लिओन ने लव स्टोरीज की एक इ बुक प्रकाशित की थी जिसका नाम स्वीट ड्रीम्स था। इस इ बुक को समीक्षकों ने काफी सराहा।  
  •  सनी लिओन हिंदी के अलावा इंग्लिश, तेलगू और बांग्लादेशी फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं। 
  •  सनी लिओन की आत्मकथा पर एक वेब सीरीज करेनजीत कौर -द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ सनी   लिओन जुलाई 2018 में रिलीज़ होने वाली है। 







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